दिल्ली के अक्षरधाम Swaminarayan Akshardham में 108 फीट ऊंची नीलकंठ वर्णी की एक पैर पर खड़ी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का भव्य अनावरण किया गया। यह ऐतिहासिक क्षण महंत स्वामी महाराज की पावन उपस्थिति में संपन्न हुआ, जिसने इसे आध्यात्मिक रूप से और भी विशेष बना दिया। इस भव्य समारोह में शामिल होने के लिए यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों से लगभग 300 संत और महंत दिल्ली पहुंचे।
नीलकंठ वर्णी की प्रेरणादायक यात्रा
भगवान स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में घर त्यागकर लोक कल्याण के लिए एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की थी। करीब 7 वर्षों तक चली इस यात्रा में उन्होंने 12,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तय की और बदरीनाथ, केदारनाथ, कैलाश मानसरोवर, मुक्तिनाथ, कामाख्या मंदिर, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी और द्वारका जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें नीलकंठ वर्णी के नाम से जाना जाने लगा।
मूर्ति की खासियतें
यह प्रतिमा 108 फीट ऊंची है और 8 फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित की गई है। पांच धातुओं से निर्मित यह मूर्ति दुनिया की पहली ऐसी प्रतिमा है, जो एक पैर पर खड़ी होकर तपस्या का अद्भुत प्रतीक प्रस्तुत करती है।
इसे तैयार करने में लगभग एक वर्ष का समय लगा। अक्षरधाम के साधु-शिल्पकारों, करीब 50 कारीगरों और कई स्वयंसेवकों ने मिलकर इस भव्य प्रतिमा को आकार दिया है।
मानवता का संदेश देती भव्य प्रतिमा
यह विशाल मूर्ति त्याग, सेवा, करुणा, समर्पण और मानवता जैसे सार्वभौमिक मूल्यों का संदेश देती है। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रेरणा का भी केंद्र है।









