बिहार की राजनीति की सबसे प्रतिष्ठित सीटों में शामिल बांकीपुर ने इस बार मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। वर्षों से भाजपा के अभेद्य किले माने जाने वाले इस विधानसभा क्षेत्र में पहली बार जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ऐसा चुनावी संघर्ष खड़ा किया, जिसने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी। मतदान के बाद सामने आए एग्जिट पोल संकेत दे रहे हैं कि भाजपा को इस बार पहले जैसी एकतरफा बढ़त नहीं मिल सकती, लेकिन पार्टी अब भी जीत की सबसे मजबूत दावेदार बनी हुई है। वहीं, राजद की स्थिति सबसे ज्यादा कमजोर होती दिखाई दे रही है और प्रशांत किशोर इस चुनाव के सबसे बड़े राजनीतिक सरप्राइज बनकर उभरते नजर आ रहे हैं।
बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यहां लगभग 59 से 63 प्रतिशत तक वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की थी। यही वजह है कि इस बार भी विपक्ष का पूरा फोकस भाजपा के इस किले में सेंध लगाने पर रहा।
एग्जिट पोल के अनुसार भाजपा का वोट प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में कुछ कम हो सकता है, लेकिन पार्टी का कोर वोट बैंक पूरी तरह उसके साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। कायस्थ और भूमिहार समाज का मजबूत समर्थन भाजपा के पक्ष में माना जा रहा है। कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़े वर्गों के मतदाताओं का भी झुकाव भाजपा की ओर दिखाई दे रहा है। दलित वोटों में मुकाबला बराबरी का माना जा रहा है, जिससे भाजपा को बड़ा नुकसान होता नहीं दिख रहा।
दूसरी ओर प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को पूरी तरह त्रिकोणीय बना दिया। एग्जिट पोल के अनुसार ब्राह्मण समाज के एक वर्ग, सवर्ण युवाओं तथा शहरी शिक्षित मतदाताओं के बीच उन्हें अच्छा समर्थन मिला है। यदि यह रुझान मतगणना में भी कायम रहता है तो जन सुराज के लिए यह बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी। माना जा रहा है कि पार्टी 35 से 40 प्रतिशत तक वोट हासिल कर सकती है।
इस चुनाव में सबसे अधिक नुकसान राजद को होता दिखाई दे रहा है। एग्जिट पोल के मुताबिक मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा जन सुराज की ओर गया है। वहीं यादव और वैश्य वोटों में भी बिखराव देखने को मिला है। यदि यही तस्वीर नतीजों में बदलती है तो राजद तीसरे स्थान पर पहुंच सकता है, जो पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका होगा।
इस बार का चुनाव केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहा। भाजपा ने राष्ट्रवाद, विकास, संगठन और अपने मजबूत बूथ नेटवर्क के भरोसे चुनाव लड़ा, जबकि प्रशांत किशोर ने रोजगार, शिक्षा और नई राजनीति को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया। यही कारण है कि मुकाबला पहले की तुलना में कहीं अधिक रोचक और करीबी दिखाई दे रहा है।
हालांकि भाजपा के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि उसका पारंपरिक सामाजिक आधार पूरी तरह नहीं टूटा। वोट प्रतिशत में कुछ गिरावट की संभावना के बावजूद पार्टी अब भी सबसे आगे दिखाई दे रही है। मजबूत संगठन, अनुभवी चुनावी मशीनरी और वर्षों से तैयार बूथ नेटवर्क भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बने हुए हैं।
यदि एग्जिट पोल के संकेत सही साबित होते हैं तो भाजपा एक बार फिर बांकीपुर का किला बचाने में सफल हो सकती है। जीत का अंतर भले पहले जैसा बड़ा न रहे, लेकिन लगातार एक और जीत यह संदेश देगी कि भाजपा का जनाधार अब भी मजबूत है। वहीं प्रशांत किशोर ने यह जरूर साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में उन्हें अब हल्के में नहीं लिया जा सकता। दूसरी ओर राजद के लिए यह चुनाव गंभीर आत्ममंथन का कारण बन सकता है।
अब सबकी निगाहें मतगणना पर टिकी हैं। एग्जिट पोल केवल रुझान हैं, अंतिम फैसला जनता के मतों की गिनती के बाद ही सामने आएगा। तब पता चलेगा कि भाजपा अपना गढ़ बचाने में सफल रही या बांकीपुर ने बिहार की राजनीति को नया संदेश दिया।