ज्ञान, विद्या और कला की देवी मां सरस्वती के पावन पर्व बसंत पंचमी को लेकर शिव की नगरी काशी में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। शहर भर में पंडाल सजकर तैयार हैं और मां सरस्वती की मनमोहक प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा चुका है। मूर्तिकारों ने अपनी कला और श्रद्धा से इन प्रतिमाओं में जान डाल दी है, लेकिन इस वर्ष की तैयारी में एक खास संदेश भी छिपा है, जिसने सबका ध्यान खींचा है।
बसंत पंचमी के लिए मूर्तिकारों ने पिछले करीब एक महीने से लगातार काम किया है। इस काम में पूरा परिवार सहयोग करता है -मिट्टी गढ़ने, रंग भरने और आभूषण सजाने तक का काम घर के सदस्य संभालते हैं। मूर्तिकारों ने बताया कि हर साल उनकी कार्यशालाओं में 40 से 50 मां सरस्वती की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, जिनकी खरीददारी मुख्य रूप से स्कूल, कॉलेज और पूजा समितियां करती हैं।
काशी की एक अनूठी और वर्षों पुरानी परंपरा है जिसे आज भी निभाया जाता है। मूर्तिकारों के अनुसार, चूंकि यह महादेव की नगरी है, इसलिए परंपरा के तहत वे सबसे पहले भगवान शिव की मूर्ति का निर्माण करते हैं, और उसके बाद ही मां सरस्वती की प्रतिमाओं को आकार दिया जाता है। यह श्रद्धा और कला का एक अद्भुत संगम है, जिसे पीढ़ियां संभाल रही हैं।
इस वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर तैयार की गई प्रतिमाओं में एक खास संदेश समाहित है। मूर्तिकारों ने बताया कि इस बार प्रतिमाओं की थीम ‘नारी सशक्तिकरण’ (Women Empowerment) पर केंद्रित है। मां सरस्वती को केवल ज्ञान की देवी के रूप में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, ज्ञान और शक्ति के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह सशक्त संदेश प्रतिमाओं के हाव-भाव, रंगों और सजावट में स्पष्ट रूप से झलक रहा है।
बसंत पंचमी के पावन अवसर पर, काशी के मूर्तिकारों की मेहनत और कला ने शहर की सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर जीवंत कर दिया है। इन आकर्षक और संदेशपूर्ण प्रतिमाओं को देखने और खरीदने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है।









