हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग में कौन-कौन से देश हैं सऊदी अरब के साथ?

जानिए यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई में सऊदी अरब का साथ कौन-से देश दे रहे हैं।

यमन के हूती विद्रोहियों के साथ संघर्ष बढ़ने के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई हैं। हूती लड़ाकों ने यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब के आसपास रणनीतिक इलाकों में अपनी स्थिति मजबूत की है। इसके साथ ही सऊदी अरब के शहरों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और सैन्य ठिकानों पर हमलों का खतरा भी बढ़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक, हालिया हूती अभियान ने सऊदी समर्थित यमनी बलों को बड़ा झटका दिया है और रियाद के सामने सैन्य विकल्प सीमित हुए हैं।

ऐसे हालात में सऊदी अरब दूसरे देशों से सैन्य और खुफिया सहायता मांग रहा है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है, जबकि ब्रिटेन से सैन्य सलाहकारों की मदद मांगी गई है। सबसे ज्यादा चर्चा सऊदी अरब और इजरायल के बीच सामने आए कथित खुफिया सहयोग की हो रही है। वहीं, पाकिस्तान और तुर्की के साथ हाल में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर भी सवाल उठ रहे हैं।

इजरायल से मांगी खुफिया मदद

सऊदी अरब और इजरायल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बावजूद रिपोर्टों के मुताबिक हूती खतरे के बीच दोनों देशों के बीच सीमित सुरक्षा सहयोग सामने आया है। द जेरूसलम पोस्ट समेत कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी अरब ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के माध्यम से इजरायल से हूती गतिविधियों से जुड़ी खुफिया जानकारी मांगी। रिपोर्टों के अनुसार, यह मदद खास तौर पर हूती लड़ाकों की तैनाती और लाल सागर तथा बाब अल-मंदेब से जुड़े खतरों की जानकारी जुटाने पर केंद्रित हो सकती है।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में इजरायल की ओर से सऊदी क्षेत्र में सीधे सैन्य अभियान शुरू किए जाने की पुष्टि नहीं है। अभी सामने आया सहयोग मुख्य रूप से खुफिया जानकारी साझा करने तक सीमित बताया जा रहा है।

अमेरिका सीधे जंग में नहीं उतरा

सऊदी अरब का लंबे समय से अमेरिका के साथ मजबूत रक्षा संबंध रहा है, लेकिन मौजूदा हूती संघर्ष में वॉशिंगटन ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी है।

अमेरिका की भूमिका फिलहाल खुफिया सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय तक सीमित बताई जा रही है। सऊदी अरब की जरूरतों को लेकर अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत भी हुई है। रॉयटर्स के मुताबिक, सऊदी अरब को अमेरिका और पश्चिमी देशों से मिलने वाली सीधी सैन्य सहायता सीमित रहने की स्थिति में दूसरे विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।

ब्रिटेन से भी मांगी गई मदद

सऊदी अरब ने ब्रिटेन से भी सहायता मांगी है। रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद की कोशिश बाब अल-मंदेब क्षेत्र में हूती खतरे को कम करने और अपने तेल तथा दूसरे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा मजबूत करने की है।

ब्रिटेन की ओर से सैन्य सलाहकार भेजने की बात सामने आई है, लेकिन ब्रिटिश सेना के सीधे यमन में जाकर हूती ठिकानों पर हमले करने की घोषणा नहीं हुई है।

यमन की सरकारी सेना भी लड़ाई में शामिल

सऊदी अरब को यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार से जुड़े सैन्य बलों का भी समर्थन हासिल है। ये बल हूतियों के खिलाफ अलग-अलग मोर्चों पर लड़ रहे हैं।

हालांकि, हालिया हूती अभियान में सऊदी समर्थित बलों को कई इलाकों में पीछे हटना पड़ा है। हूतियों ने लाल सागर के तट और बाब अल-मंदेब के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की है, जिससे सऊदी अरब की समुद्री और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है।

फिर पाकिस्तान और तुर्की क्यों नहीं आए आगे?

सबसे बड़ा सवाल हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर है। 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा और तीनों देश सामूहिक सुरक्षा सहयोग बढ़ाएंगे। लेकिन हूती हमलों के बाद भी इस समझौते के तहत अभी तक कोई संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं हुई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने 10 सितंबर को स्पष्ट किया था कि हूती हमलों के बाद समझौते के तहत किसी तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। साथ ही पाकिस्तान ने समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी।

वहीं, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बाद में कहा कि अगर सऊदी अरब पर हमला होता है या यमन संघर्ष सऊदी क्षेत्र में फैलता है, तो मक्का समझौता सक्रिय हो सकता है। हालांकि, इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि पाकिस्तान सीधे यमन में जाकर हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाएगा।

क्या मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान को तुरंत लड़ना होगा?

समझौते में सामूहिक रक्षा का सिद्धांत जरूर शामिल है, लेकिन इसके तहत सैन्य प्रतिक्रिया का वास्तविक स्वरूप अभी स्पष्ट रूप से तय नहीं हुआ है।

विश्लेषणों के मुताबिक, सऊदी अरब को यह तय करना होगा कि उसे किस तरह की मदद चाहिए। यह मदद खुफिया जानकारी, एयर डिफेंस, सैन्य उपकरण या सीधे सैनिकों की तैनाती के रूप में हो सकती है। फिलहाल रियाद ने पाकिस्तान या तुर्की के साथ समझौते को औपचारिक रूप से सक्रिय नहीं किया है।

सऊदी अरब के सामने बढ़ती चुनौती

मौजूदा स्थिति में सऊदी अरब एक साथ कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है। हूतियों की बढ़ती सैन्य क्षमता, लाल सागर और बाब अल-मंदेब में समुद्री खतरा और ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंता ने रियाद पर दबाव बढ़ाया है।

यही वजह है कि सऊदी अरब अमेरिका, ब्रिटेन, इजरायल, मिस्र और अन्य क्षेत्रीय साझेदारों से अलग-अलग स्तर पर मदद लेने की कोशिश कर रहा है। वहीं, पाकिस्तान और तुर्की के साथ हालिया मक्का रक्षा समझौते की असली उपयोगिता का सवाल भी पहली बड़ी सुरक्षा चुनौती के बीच सामने आ गया है।

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