नई दिल्ली: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज के दौरान किए गए कार्यों के लिए कानूनी कार्रवाई से मिलने वाली आजीवन छूट का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने 4 नवंबर को इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से जवाब मांगा है।
मामला मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 से जुड़ा है। इस धारा के तहत चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों या दिए गए बयानों के संबंध में सिविल और आपराधिक कार्यवाही से संरक्षण मिलता है। यह सुरक्षा पद छोड़ने के बाद भी जारी रहती है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में 4 नवंबर को सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अरुण कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
पीठ ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर इस कानूनी प्रावधान पर उनका पक्ष मांगा है। याचिका में धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
इससे पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने भी इसी धारा के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। ADR की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 13 अक्टूबर को नोटिस जारी कर चुका है। अदालत में इस मुद्दे को लेकर लोक प्रहरी की एक अन्य याचिका भी लंबित है।
धारा 16 में क्या प्रावधान है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के मुताबिक, कोई भी अदालत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती या जारी नहीं रख सकती, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त रहा हो, यदि मामला उसके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य, गतिविधि या बयान से संबंधित है।
इसका मतलब है कि यह कानूनी संरक्षण केवल मौजूदा चुनाव आयुक्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि पद छोड़ चुके पूर्व चुनाव आयुक्तों पर भी लागू होता है। हालांकि, प्रावधान का दायरा आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन या उसके निर्वहन का दावा करते हुए किए गए कार्यों तक है। इसे निजी जीवन के हर काम के लिए छूट नहीं समझना चाहिए।
ADR ने अपनी याचिका में क्या दलील दी?
ADR ने अपनी याचिका में धारा 16 को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 तथा संविधान की मूल संरचना के खिलाफ बताया है। संगठन का तर्क है कि इस प्रावधान से चुनाव आयुक्तों को व्यापक और आजीवन कानूनी संरक्षण मिल जाता है, जिससे उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े कथित गलत कार्यों पर भी न्यायिक कार्रवाई का रास्ता बंद हो सकता है।
ADR का कहना है कि इस कानून में संरक्षण को सद्भावना यानी Good Faith की शर्त से नहीं जोड़ा गया है। साथ ही, इसमें मुकदमा चलाने के लिए किसी विशेष मंजूरी की व्यवस्था या ऐसा कोई अपवाद भी नहीं है, जिससे गंभीर मामलों में न्यायिक कार्रवाई संभव हो सके।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को इस तरह की व्यापक और आजीवन छूट हासिल नहीं है, तो चुनाव आयुक्तों को ऐसा संरक्षण क्यों दिया गया है।
कानून में यह छूट क्यों जोड़ी गई?
इस प्रावधान के समर्थन में चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्र रूप से काम करने और अनावश्यक मुकदमों के दबाव से बचाने का तर्क दिया जाता रहा है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के अधिकारियों को चुनाव संबंधी संवेदनशील फैसले लेने होते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ लगातार मुकदमों की आशंका उनके कामकाज को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि अधिकारियों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण देना अलग बात है और उन्हें आजीवन व्यापक कानूनी छूट देना अलग। उनके मुताबिक, स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
क्या पहले भी इस कानून को चुनौती दी गई है?
हां। लोक प्रहरी नामक संगठन ने भी धारा 16 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस याचिका पर जनवरी 2026 में अदालत ने केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया था। अदालत ने उस समय इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद ADR ने भी इसी मुद्दे पर याचिका दाखिल की। अब अलग-अलग याचिकाओं के जरिए यह सवाल अदालत के सामने है कि क्या संसद चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए इस तरह का आजीवन कानूनी संरक्षण दे सकती है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए धारा 16 जैसा संरक्षण संवैधानिक रूप से उचित है या नहीं। क्या यह प्रावधान चुनाव आयुक्तों को अनावश्यक मुकदमों से बचाता है या फिर जवाबदेही और न्याय पाने के अधिकार को सीमित कर देता है?
फिलहाल अदालत ने सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। जब तक अदालत कोई अलग आदेश नहीं देती, यह प्रावधान लागू रहेगा।
ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग क्यों हैं चर्चा में?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाला चुनाव आयोग हाल के दिनों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भी चर्चा में रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन पुराने मतदाताओं का नाम मौजूदा मतदाता सूची में नहीं है, वे भी नया नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भर सकते हैं।
आयोग ने ऐसे मतदाताओं से आवेदन करने और मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने की अपील की है। हालांकि, मतदाता सूची से जुड़े इस मामले और चुनाव आयुक्तों को कानूनी छूट देने वाली धारा 16 की संवैधानिक चुनौती के बीच कोई सीधा कानूनी संबंध नहीं है।


