बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर लगातार हमलों की खबरें सामने आ रही हैं। हाल ही में हबीगंज जिले के बनियाचोंग पुलिस स्टेशन से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने देश और दुनिया में चिंता बढ़ा दी है। वीडियो में एक युवक खुद को हबीगंज का छात्र नेता बताता है और दावा करता है कि जुलाई 2024 में उसने पुलिस स्टेशन में आग लगाई और हिंदू सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू को भीड़ के हवाले कर दिया।
इस घटना का समय अगस्त 2024 का है, जब राजनीतिक तनाव चरम पर था। तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे से कुछ घंटे पहले इलाके में हिंसा भड़क गई थी। उस रात भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला किया। पुलिस ने आत्मरक्षा में फायरिंग की, जिसमें कुछ लोग मारे गए। लेकिन भीड़ रुकी नहीं। करीब ढाई बजे रात को वापस लौटकर, सेना की मौजूदगी में बाकी पुलिसकर्मियों को छोड़ने के बाद सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू को पीट-पीटकर मार दिया गया। उनका शव अगले दिन सड़क पर छोड़ दिया गया।
हबीगंज जिले में हिंदू आबादी लगभग 16 प्रतिशत है। इस वीडियो और बयान ने उस भयावह घटना को फिर चर्चा में ला दिया। मानवाधिकार संगठन और आम जनता ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग तेज कर दी है।
ये पहला मामला नहीं है। पिछली साल 18 दिसंबर 2025 को दीपू चंद्र दास की भीड़ ने ईशनिंदा के झूठे आरोप पर उनकी हत्या कर दी थी। उनके शव को पेड़ से लटकाकर आग के हवाले कर दिया गया। जांच में यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने सच में कोई धार्मिक टिप्पणी की थी।
इन घटनाओं ने न सिर्फ कानून‑व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, न्याय प्रणाली की जवाबदेही और सामाजिक सहिष्णुता के बारे में गंभीर चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। बांग्लादेश की सरकार की क्षमता और नीतियों पर भी आलोचनाएं तेज हो गई हैं।
हबीगंज की यह घटना केवल एक पुलिसकर्मी की हत्या नहीं है। यह उन लाखों अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल है, जो हर दिन अपनी जान और सम्मान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दुनिया की निगाहें अब बांग्लादेश की न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी हैं। इस मामले से जुड़े सभी अपडेट्स हम लगातार आपके लिए लाते रहेंगे।









