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JNU में फिर लगे ‘विवादित नारे’, SC के फैसले के बाद कैंपस में हंगामा, गिरिराज सिंह ने बताया ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का अड्डा

protest

देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में से एक, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद, JNU कैंपस में देर रात छात्रों के एक समूह ने प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक और विवादास्पद नारेबाजी किए जाने की खबरें सामने आई हैं, जिसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में हंगामा मच गया है।

5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले के तुरंत बाद JNU कैंपस में यह प्रदर्शन शुरू हुआ। प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए नारों ने एक बार फिर देश की संप्रभुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं पर बहस छेड़ दी है। इस घटना पर केंद्रीय मंत्रियों ने तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया दी है।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम पर सबसे आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने सीधे तौर पर JNU को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का अड्डा बताते हुए कहा कि यह यूनिवर्सिटी अब देश विरोधी मानसिकता वाले लोगों का ठिकाना बनती जा रही है। गिरिराज सिंह ने स्पष्ट किया कि यह 21वीं सदी का भारत है, पीएम मोदी का भारत है, और देश अपनी सुरक्षा या संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने उमर खालिद और शरजील इमाम का समर्थन करने वालों को सीधे तौर पर देशद्रोही करार दिया।

गिरिराज सिंह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राष्ट्रीय जनता दल (RJD), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और वामपंथी दलों पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सभी दल ऐसी सोच को संरक्षण दे रहे हैं, जो देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है। उन्होंने उमर खालिद के पुराने बयानों का संदर्भ देते हुए कहा कि जिसने ‘चिकन नेक’ को अलग करने जैसी योजना बनाई थी, उसने कसाब से भी बड़ा जुर्म किया है। मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इन प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

JNU में हुई इस नारेबाजी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यूनिवर्सिटी विचारों के संवाद का केंद्र रहेगी, या राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बनती जाएगी। फिलहाल, यह घटना देशभर में राष्ट्रवाद, कानून और विरोध के अधिकार की सीमाओं पर नई बहस पैदा कर चुकी है।

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