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काशी में होलिका दहन और रंगोत्सव: विद्वानों ने शुभ मुहूर्त पर दिया महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण

वाराणसी, जिसे काशी के नाम से भी जाना जाता है, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। हाल ही में, यहां के प्रमुख विद्वानों ने होलिका दहन और रंगोत्सव की तिथियों और शुभ मुहूर्त को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। यह जानकारी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी ताकि वे धर्मशास्त्रीय नियमों के अनुसार पर्व मना सकें।

काशी के विद्वानों ने धर्मशास्त्रीय आधार पर स्पष्ट किया था कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 2 मार्च की रात्रि 11:57 बजे से प्रारंभ हुआ था, जबकि रंगों का पर्व 4 मार्च को मनाया गया था। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा तिथि में होलिका दहन और प्रतिपदा तिथि में रंगोत्सव मनाने की परंपरा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि 2 मार्च को भद्रा का प्रभाव रहने के बावजूद, लोकाचार और शास्त्रीय मान्यता के अनुसार रात्रि 11:57 बजे के बाद होलिका दहन करना उचित था।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ज्योतिष विभाग के प्रो. विनय पांडेय के अनुसार, उस वर्ष पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को शाम 5:21 बजे से प्रारंभ हुई थी। उसी दिन भद्रा भी लग रही थी, जिसका मुख्य काल रात्रि 2:03:45 बजे से प्रातः 4:03:45 बजे तक रहा था। विद्वानों ने विस्तृत गणना के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि 2 मार्च की रात्रि 11:57 बजे से 1:15 बजे तक का समय, भद्रा के प्रभाव से मुक्त होने के कारण, होलिका दहन के लिए अत्यंत शुभ था।

काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय ने भी इस निर्णय की पुष्टि करते हुए बताया कि 2 मार्च की शाम लगभग 5:18 बजे से भद्रा प्रारंभ होकर 3 मार्च की सुबह 4:56 बजे तक प्रभावी रही थी। इसलिए, 3 मार्च की रात्रि में पूर्णिमा तिथि उपलब्ध न होने के कारण, उस दिन होलिका दहन शास्त्रसम्मत नहीं माना गया। इस प्रकार, शास्त्रीय निर्णयों के अनुसार होलिका दहन 2 मार्च की रात्रि में और रंगों का पर्व 4 मार्च को ही संपन्न हुए थे।

यह स्पष्टीकरण काशी के विद्वानों की गहन धार्मिक ज्ञान और परंपराओं के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है। इससे श्रद्धालुओं को पर्वों को सही विधि-विधान से मनाने में सहायता मिली थी।

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