भारतीय राजनीति का केंद्र अब सड़क रैलियों से हटकर देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो अपनी आक्रामक राजनीति के लिए जानी जाती हैं, ने हाल ही में विधानसभा चुनावों से पहले SIR (Special Intensive Revision) यानी वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बीते दिन हुई सुनवाई में जो हुआ, वह अभूतपूर्व था: ममता बनर्जी ने अपने वकीलों के बजाय खुद अदालत में खड़े होकर दलीलें पेश कीं और चुनाव आयोग (EC) पर गंभीर आरोप लगाए। यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र और वोटर के अधिकारों का बड़ा टकराव बन चुका है।
ममता ने खुद रखी दलीलें, बताया SIR ‘उत्पीड़न का हथियार’
सुप्रीम कोर्ट में CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई कर रही थी। कानून स्नातक ममता बनर्जी ने करीब 20 मिनट तक अपने वकील श्याम दीवान की दलीलें सुनने के बाद, खुद हस्तक्षेप करने की इच्छा व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह पहली बार था जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री स्वयं अदालत में दलील देने के लिए खड़ी हुईं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जो काम सामान्य तौर पर 2 साल में होना चाहिए, उसे चुनाव से ठीक पहले 3 महीने में क्यों किया जा रहा है? यह प्रक्रिया वोटरों को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि नाम काटने और उत्पीड़न के लिए चलाई जा रही है।”
चुनाव आयोग पर लगे प्रमुख आरोप
ममता बनर्जी ने अदालत में चुनाव आयोग (EC) की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े किए और चौंकाने वाले दावे किए:
1. वोटर सप्रेशन का आरोप: ममता बनर्जी ने अदालत को बताया कि शादी के बाद ससुराल जाने वाली बेटियों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। उनका पता या टाइटल बदलने मात्र से नाम काट दिया गया है। इस आरोप पर CJI जस्टिस सूर्यकांत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और स्पष्ट किया कि केवल टाइटल या पता बदलने के आधार पर नाम हटाना मतदाता सूची से हटाने का आधार नहीं हो सकता।
2. BO’s पर भारी दबाव: उन्होंने चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया के भारी दबाव के चलते 100 से अधिक BLOs (बूथ लेवल अधिकारी) की मौत हो चुकी है और कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं।
3. बंगाल को निशाना बनाना: ममता ने आरोप लगाया कि सिर्फ पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि असम जैसे अन्य राज्यों में यह गहन संशोधन प्रक्रिया (SIR) क्यों नहीं की जा रही है।
4. आधार कार्ड पर असहमति: उन्होंने यह भी कहा कि आधार कार्ड को दस्तावेज मानने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है, जिससे लॉजिकल विसंगति के नाम पर लोगों को परेशान किया जा रहा है।
चुनाव आयोग का तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया
चुनाव आयोग के वकील ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि SIR कार्यक्रम वोटर लिस्ट को साफ करने और फर्जी नामों को हटाने के लिए बेहद आवश्यक है। जब चुनाव आयोग के वकील ने बीच में टोकने की कोशिश की, तो CJI ने उन्हें शांत रहने को कहा और टिप्पणी की कि “मैम इतनी दूर से अपनी बात रखने आई हैं।” हालांकि, कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर यह स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले ही लंबी बहस हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट में यह टकराव सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र, वोटर और सत्ता के बीच का बड़ा संघर्ष बन चुका है। अब पूरे देश की निगाहें शीर्ष अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि आगामी चुनावों में बंगाल के वोटरों की आवाज कितनी सुरक्षित रहेगी और SIR प्रक्रिया पर क्या फैसला आता है।









