नई दिल्ली: उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों को लेकर सामने आई एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, उत्तर कोरिया के माउंट मंताप क्षेत्र में 2008 से 2025 के बीच 1,399 छोटे भूकंप दर्ज किए गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन भूकंपीय गतिविधियों का संबंध क्षेत्र में किए गए भूमिगत परमाणु परीक्षणों से हो सकता है। स्टडी के अनुसार, खास तौर पर 2017 के परमाणु परीक्षण के बाद भूकंपों की संख्या और तीव्रता में लगातार बढ़ोतरी देखी गई।
17 साल के आंकड़ों में मिले 1,399 भूकंप
अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ने चीन और दक्षिण कोरिया में लगे भूकंपीय निगरानी स्टेशनों से मिले 2008 से 2025 तक के डेटा का विश्लेषण किया। ये स्टेशन माउंट मंताप से करीब 80 से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे। शोधकर्ताओं ने बेहद छोटे भूकंपों का पता लगाने के लिए विशेष पैटर्न-मैचिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया।
इस विश्लेषण में माउंट मंताप के आसपास कुल 1,399 स्थानीय भूकंप मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, सामान्य निगरानी से कई छोटे झटके दर्ज नहीं हो पाते हैं, इसलिए पहले उपलब्ध भूकंपों के रिकॉर्ड की तुलना में यह संख्या काफी अधिक है।
करीब 2 हजार साल से शांत था इलाका
माउंट मंताप उत्तर कोरिया के पुंग्ग्ये-री परमाणु परीक्षण स्थल का हिस्सा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऐतिहासिक रिकॉर्ड में इस इलाके के आसपास लंबे समय तक बहुत कम भूकंपीय गतिविधि का उल्लेख मिलता है।
अध्ययन में चीन और कोरिया के 2,000 साल से अधिक पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन रिकॉर्ड में माउंट मंताप के आसपास बड़े पैमाने पर भूकंपों की गतिविधि नहीं मिलती। इसी वजह से परमाणु परीक्षणों के बाद बढ़ी भूकंपीय गतिविधि वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखती है।
2017 के परमाणु परीक्षण के बाद बदली तस्वीर
उत्तर कोरिया ने 2006 से 2017 के बीच कुल छह भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2017 के छठे और सबसे बड़े परीक्षण के बाद स्थिति में बड़ा बदलाव आया।
स्टडी के अनुसार, इस परीक्षण के बाद भूकंपीय गतिविधि तुरंत खत्म होने के बजाय अगले कई वर्षों तक बढ़ती रही। खास बात यह है कि परीक्षण के करीब तीन सप्ताह बाद भूकंपों की गतिविधि बढ़नी शुरू हुई और 2025 तक उनकी आवृत्ति तथा तीव्रता में वृद्धि देखी गई।
6.3 तीव्रता का झटका और पहाड़ में बदलाव
2017 का परमाणु परीक्षण इतना शक्तिशाली था कि इससे करीब 6.3 तीव्रता का भूकंपीय झटका दर्ज हुआ। वैज्ञानिक अध्ययनों में इस परीक्षण के बाद भूमिगत सुरंगों के धंसने और माउंट मंताप की सतह पर बड़े पैमाने पर बदलाव के संकेत भी मिले थे।
सैटेलाइट रडार से किए गए अध्ययनों में पहाड़ की चोटी के आसपास जमीन में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए। नए अध्ययन के मुताबिक, इसी शक्तिशाली विस्फोट ने इलाके की चट्टानों और पहले से मौजूद भ्रंशों पर लंबे समय तक असर डाला हो सकता है।
ज्यादातर भूकंप बहुत छोटे थे
वैज्ञानिकों के अनुसार, दर्ज किए गए अधिकांश भूकंप बेहद कम तीव्रता वाले थे। कई झटकों की तीव्रता करीब 2 से 3 के बीच रही। खास बात यह है कि इनमें से कई भूकंप जमीन की सतह के काफी करीब आए।
कोरिया टाइम्स के मुताबिक, शुरुआती वर्षों में भूकंपों की तीव्रता करीब 1 से 1.3 के आसपास थी, लेकिन 2023 और 2024 में कुछ झटके 3 से अधिक तीव्रता के भी दर्ज किए गए।
पुरानी दरारें हुईं सक्रिय
शोधकर्ताओं का मानना है कि लगातार परमाणु विस्फोटों ने माउंट मंताप के नीचे मौजूद चट्टानों को कमजोर किया और जमीन के अंदर तनाव की स्थिति को बदल दिया। इसके बाद पहले से मौजूद कुछ भ्रंश सक्रिय हो गए।
अध्ययन में भूकंपों के स्थानों का विश्लेषण करने पर दो ऐसी संरचनाओं के संकेत मिले, जो पहले से मौजूद या पहले अज्ञात भ्रंश हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंपों का इन संरचनाओं के आसपास केंद्रित होना इस बात का संकेत है कि यह गतिविधि महज संयोग नहीं बल्कि भ्रंशों के दोबारा सक्रिय होने से जुड़ी हो सकती है।
पानी के दबाव से भी बढ़ सकती है भूकंपीय गतिविधि
वैज्ञानिकों के अनुसार, भूमिगत परमाणु विस्फोटों से चट्टानों में नई दरारें बन सकती हैं और पहले से मौजूद दरारें भी सक्रिय हो सकती हैं। इन दरारों में पानी पहुंचने के बाद भूमिगत पानी का दबाव बढ़ सकता है।
यह दबाव चट्टानों और भ्रंशों पर अतिरिक्त तनाव पैदा कर सकता है, जिससे छोटे भूकंप आने की प्रक्रिया लंबे समय तक जारी रह सकती है। हालांकि, शोधकर्ता इस पूरी प्रक्रिया को परमाणु परीक्षणों के बाद हुए भूगर्भीय बदलावों से जोड़कर देख रहे हैं।
परमाणु परीक्षणों का असर खत्म नहीं हुआ?
इस अध्ययन की सबसे अहम बात यह है कि 2017 में उत्तर कोरिया के आखिरी ज्ञात परमाणु परीक्षण के करीब नौ साल बाद भी माउंट मंताप क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधि बढ़ती रही। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे पता चलता है कि भूमिगत परमाणु विस्फोटों का असर सिर्फ परीक्षण के समय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कुछ परिस्थितियों में आसपास की भूगर्भीय संरचना पर लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है।
स्टडी 17 सितंबर 2026 को Science जर्नल में प्रकाशित हुई है और इसके निष्कर्ष पुराने परमाणु परीक्षण स्थलों की निगरानी तथा भूमिगत विस्फोटों के दीर्घकालिक भूगर्भीय प्रभावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।


