अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी की मजबूती से संसद में उनका राजनीतिक रास्ता मुश्किल हो सकता है, तो दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उनकी नीतियों को लेकर असंतोष की चर्चा है। ईरान युद्ध, टैरिफ, रूस-यूक्रेन नीति और भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी—इन सभी मुद्दों को ट्रंप की चुनावी चुनौती से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, दिए गए टीवी स्क्रिप्ट के कुछ चुनावी आंकड़ों और सर्वे के दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। खास तौर पर प्रतिनिधि सभा की सीटों का कुल जोड़ 435 नहीं हो रहा है और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के सर्वे का नाम व तारीख नहीं दी गई है। इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य की तरह प्रकाशित करने से पहले स्रोत से मिलाना चाहिए।
चुनावी झटके के बाद रिपब्लिकन पार्टी में बढ़ी नाराजगी
मिडटर्म चुनाव में हार के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर जिम्मेदारी तय करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के कुछ नेता रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को ईरान युद्ध में अमेरिका को शामिल कराने और युद्ध से बाहर निकलने की स्पष्ट रणनीति न होने के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग की मांग तक उठ रही है। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी हार के पीछे सिर्फ ईरान युद्ध ही नहीं, बल्कि महंगाई और दूसरी घरेलू समस्याएं भी अहम वजह रही हैं।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी चुनावी हार के बाद ईरान युद्ध को पार्टी के नुकसान की बड़ी वजह बताया है। उन्होंने युद्ध खत्म करने, महंगाई और आम लोगों की जीवन-यापन की लागत पर ध्यान देने तथा ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को प्राथमिकता देने की बात कही। वेंस का यह रुख ट्रंप के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी में नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर खींचतान तेज हो सकती है।
ईरान युद्ध और टैरिफ बने ट्रंप की मुश्किल
ट्रंप ने अपनी विदेश नीति को अमेरिका की ताकत और वैश्विक नेतृत्व के तौर पर पेश किया था, लेकिन ईरान युद्ध और व्यापारिक टैरिफ का असर अब अमेरिकी मतदाताओं की जेब तक पहुंच गया। युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति और तेल बाजार पर दबाव बढ़ा, जिससे ईंधन की कीमतों में तेजी आई। दूसरी तरफ ट्रंप की टैरिफ नीति ने भी महंगाई और कारोबार की लागत को लेकर चिंताएं बढ़ाईं।
रॉयटर्स की चुनाव से पहले की रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान युद्ध और टैरिफ के कारण बढ़ती कीमतें रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनावी जोखिम बन रही थीं। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस ने भी अपनी पड़ताल में बताया कि युद्ध के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई और इसका असर अमेरिकी ईंधन कीमतों पर पड़ा।
यानी विदेश नीति का मुद्दा इस बार सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक सीमित नहीं रहा। आम अमेरिकी नागरिक के लिए यह पेट्रोल, महंगाई और घरेलू खर्च से जुड़ा सवाल बन गया। डेमोक्रेट्स की जीत के बाद अब संसद में युद्ध के खर्च, रक्षा बजट और प्रशासन के फैसलों पर ज्यादा सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, राष्ट्रपति के पास सैन्य कार्रवाई और विदेश नीति से जुड़े कई अहम अधिकार बने रहेंगे।
रूस-यूक्रेन नीति पर भी उठेंगे सवाल
ट्रंप की रूस और यूक्रेन को लेकर नीति भी चुनाव के बाद बहस के केंद्र में आ सकती है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति उनके रुख और यूक्रेन को अमेरिकी समर्थन देने के सवाल पर पहले से ही अमेरिकी राजनीति में मतभेद रहे हैं। डेमोक्रेट्स के संसद में मजबूत होने के बाद यूक्रेन सहायता, रूस पर प्रतिबंध और रक्षा खर्च जैसे मुद्दों पर प्रशासन को ज्यादा राजनीतिक चुनौती मिल सकती है।
यूक्रेन के लिए यह बदलाव अहम हो सकता है, लेकिन संसद में डेमोक्रेट्स की बढ़त का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका की विदेश नीति तुरंत बदल जाएगी। राष्ट्रपति ट्रंप के पास अभी भी कई कार्यकारी अधिकार हैं। ऐसे में आने वाले समय में संसद और व्हाइट हाउस के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है।
भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं में ट्रंप के लिए घटा समर्थन
ट्रंप की चुनावी चुनौती में भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं का रुख भी चर्चा में है। Carnegie Endowment for International Peace और YouGov की ओर से किए गए अक्टूबर 2026 के Indian American Attitudes Survey के मुताबिक, अमेरिकी नागरिकता रखने वाले भारतीय मूल के 62 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अपने क्षेत्र में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को वोट देने की इच्छा जताई, जबकि 19 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन किया। सर्वे में 12 प्रतिशत लोग अनिर्णय की स्थिति में थे।
यह सर्वे 7 से 27 अक्टूबर 2026 के बीच 1,000 भारतीय-अमेरिकी वयस्कों के बीच किया गया था। वोटिंग पसंद से जुड़े आंकड़े 861 अमेरिकी नागरिकों के जवाबों पर आधारित थे। सर्वे के मुताबिक, 2024 में 30 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों ने ट्रंप का समर्थन किया था, जबकि 62 प्रतिशत ने कमला हैरिस के पक्ष में समर्थन जताया था। इसलिए मौजूदा आंकड़े को ट्रंप की व्यक्तिगत लोकप्रियता का सीधा माप नहीं, बल्कि आगामी कांग्रेस चुनाव में उम्मीदवारों के प्रति समुदाय की पसंद के रूप में समझना चाहिए।
भारत को लेकर ट्रंप के बयानों और फैसलों ने भी इस समुदाय में असंतोष की चर्चा को हवा दी है। भारत पर टैरिफ लगाने की धमकी, रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव और भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ट्रंप के बयानों पर भारतीय मूल के कई लोगों ने सवाल उठाए। इसके अलावा H-1B वीजा से जुड़ी सख्ती और अमेरिकी इमिग्रेशन नीति भी भारतीय पेशेवरों तथा उनके परिवारों के लिए चिंता का विषय रही है।
हालांकि, भारतीय-अमेरिकी समुदाय को एकसमान राजनीतिक समूह मानना सही नहीं होगा। सर्वे के मुताबिक, इस समुदाय में डेमोक्रेट, रिपब्लिकन और स्वतंत्र मतदाता तीनों मौजूद हैं। इसके बावजूद डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में 62 बनाम 19 प्रतिशत का अंतर रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक अहम राजनीतिक संकेत है।
एलन मस्क की चुनावी रणनीति को भी झटका
मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने एलन मस्क की राजनीतिक रणनीति पर भी सवाल खड़े किए हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने 2026 के चुनावों में संघीय चुनावी मुकाबलों के लिए करीब 445 मिलियन डॉलर खर्च किए और अन्य माध्यमों से भी रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन किया। इसके बावजूद जिन उम्मीदवारों के पक्ष में उन्होंने प्रचार और आर्थिक मदद की, उनमें से ज्यादातर को हार का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिनिधि सभा के 43 उम्मीदवारों में से केवल तीन जीत सके, जबकि सीनेट के सात उम्मीदवारों में से छह हार गए। टेक्सास में भी मस्क का भारी निवेश रिपब्लिकन उम्मीदवारों को जीत नहीं दिला सका। इस नतीजे ने दिखाया कि चुनाव में बड़े आर्थिक संसाधन और प्रभावशाली कारोबारी समर्थन भी मतदाताओं के रुख को पूरी तरह नहीं बदल सकते।
क्या ट्रंप की नीतियों पर लगेगा ब्रेक?
मिडटर्म चुनाव के बाद डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में बढ़त हासिल कर ली है। 5 नवंबर को उपलब्ध नतीजों के अनुसार, सीनेट में डेमोक्रेट्स 54 सीटों के साथ आगे थे, जिनमें दो निर्दलीय सांसद भी शामिल हैं। प्रतिनिधि सभा में भी डेमोक्रेट्स 240 और रिपब्लिकन 147 सीटों पर आगे थे, जबकि कई सीटों पर मतगणना जारी थी। गवर्नर चुनावों में भी डेमोक्रेट्स ने 22 और रिपब्लिकन ने 12 सीटें जीती थीं।
इस नतीजे का मतलब यह है कि ट्रंप को अपने कई विधायी प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। डेमोक्रेट्स प्रशासन के फैसलों की जांच, बजट पर बहस और ईरान युद्ध से जुड़े खर्चों पर सवाल उठा सकते हैं। लेकिन संसद में बहुमत बदलने से राष्ट्रपति के सभी अधिकार खत्म नहीं होते। टैरिफ, सैन्य कार्रवाई और विदेश नीति के कई फैसलों पर ट्रंप अब भी प्रभाव बनाए रख सकते हैं।
ऐसे में ट्रंप के सामने चुनौती सिर्फ चुनावी हार से उबरने की नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर भरोसा बनाए रखने की भी है। ईरान युद्ध, महंगाई, टैरिफ और भारत समेत दूसरे देशों के साथ संबंधों पर उनकी नीतियां अब लगातार राजनीतिक सवालों के घेरे में रहेंगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप अपनी रणनीति में बदलाव करेंगे या फिर अपनी मौजूदा नीतियों पर कायम रहकर डेमोक्रेट्स और अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट नेताओं का सामना करेंगे?


