हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों को समर्पित होता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे अनुष्ठान करते हैं। हालांकि, कई लोगों के मन में यह असमंजस रहता है कि परिवार में यह परंपरा किसे निभानी चाहिए और किसे इससे दूर रहना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर के बड़े बेटे या मुख्य पुरुष को पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का मुख्य अधिकार होता है। यदि बड़ा बेटा उपलब्ध न हो, तो छोटा बेटा या परिवार का कोई अन्य पुरुष सदस्य यह जिम्मेदारी उठा सकता है। इसके अलावा, घर में अगर कोई पुरुष सदस्य न हो, तो महिलाएं भी पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया को पूरा कर सकती हैं।
शास्त्रों के मुताबिक, जिन घरों में पुत्र नहीं हैं, वहांनाती या परिवार के नजदीकी रिश्तेदार भी श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। वहीं, संयुक्त परिवार में आमतौर पर घर के बड़े बुजुर्ग या मुखिया द्वारा ही सभी पूर्वजों की तरफ से अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।