राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने भारत की वैश्विक भूमिका, आर्थिक नीति और लक्ष्यों को लेकर एक स्पष्ट संदेश दिया है। हाल ही में मुंबई में आयोजित ‘संघ की 100 साल की यात्रा’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ किया कि भारत का अंतिम लक्ष्य ताकत के दम पर ‘सुपरपावर’ बनना नहीं, बल्कि अपने मूल्यों और संस्कृति के बल पर दुनिया का मार्गदर्शन करने वाला ‘विश्वगुरु’ बनना है। उन्होंने देशवासियों से स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील भी की।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में देश की विदेश और व्यापार नीतियों की दिशा निर्धारित करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे।
1. विश्वगुरु बनने पर फोकस, सुपरपावर नहीं
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत सुपरपावर बनने की इच्छा नहीं रखता है। उनके अनुसार, सुपरपावर बनने का मतलब अक्सर दूसरों पर दबाव बनाना और डर पैदा करना होता है, जो भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा, “हम विश्वगुरु बनना चाहते हैं। भारत ताकत नहीं, बल्कि उदाहरण पेश करके नेतृत्व करना चाहता है।” उन्होंने कहा कि भारत को अपने संस्कार, संस्कृति और सनातन मूल्यों के जरिए दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहिए। इस दौरान उन्होंने बिना किसी देश का नाम लिए, दबदबे वाली वैश्विक ताकतों के रवैये पर भी सवाल उठाए।
2. दबाव में नहीं होंगे वैश्विक समझौते
भागवत ने वैश्विक भागीदारी को आवश्यक बताया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि यह किसी के दबाव में आकर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया से जुड़ना चाहिए, लेकिन हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैश्विक रिश्ते देश के फायदे, पर्यावरण और सबसे महत्वपूर्ण रूप से रोजगार सृजन के अनुसार तय होने चाहिए, न कि किसी टैरिफ या बाहरी दबाव के आधार पर। उनका यह बयान उस समय आया है जब हाल के दिनों में भारत पर व्यापार समझौतों को लेकर विदेशी दबाव की राजनीति के आरोप लगाए जा रहे थे।
3. स्वदेशी उत्पाद अपनाएं, अर्थव्यवस्था मजबूत करें
भागवत ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए स्वदेशी उत्पादों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने उपभोक्ताओं से अपील करते हुए कहा कि सामान खरीदते समय यह जरूर सोचना चाहिए कि यह उत्पाद देश में रोजगार बढ़ाने में कैसे मदद करेगा। उनका मानना है कि कई भारतीय उत्पाद आज विदेशों में बने सामानों से बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि कई ऐसी विदेशी चीजें हैं जिनका इस्तेमाल हम रोजमर्रा की जिंदगी में करने से बच सकते हैं। देशी उत्पाद अपनाने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और युवाओं को रोजगार मिलेगा।
मोहन भागवत ने अंत में आरएसएस के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि संगठन समाज को एकजुट करके राष्ट्र को मजबूत बनाना चाहता है, जिसके लिए परिवर्तन की शुरुआत स्वयंसेवकों से होकर धीरे-धीरे पूरे समाज तक पहुंचनी चाहिए।









