एक हफ्ते में दो बड़े तूफान, देशभर में दिख रहा असर; अल नीनो ने बढ़ाई चिंता?

आंध्र प्रदेश में एक हफ्ते में दो बड़े चक्रवाती तूफ़ानों की मार ने तबाही मचा दी है. IMD ने कहा है कि "एक हफ्ते में दो तूफान संयोग हैं, लेकिन अल नीनो और गर्म समुद्र ने खतरा को बढ़ाया है.
एक हफ्ते में दो तूफान! क्या बदल रहा है समुद्र का मिजाज?

बंगाल की खाड़ी से उठे दो गंभीर चक्रवातों ने महज पांच दिनों के अंतराल में आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक देकर मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. एक तरफ 28 अक्टूबर को चक्रवात अर्नब ने आंध्र तट को प्रभावित किया, तो दूसरी तरफ 3 नवंबर की सुबह चक्रवात मुरासु ने ओंगोल के पास तट पार किया. एक ही सप्ताह में दो बड़े तूफानों का आना सामान्य घटना नहीं है. हालांकि, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक मृत्युंजय मोहपात्रा के मुताबिक, इन दोनों तूफानों का इतने कम अंतराल में आना एक संयोग है. इसके पीछे अल नीनो, अक्टूबर-नवंबर का चक्रवाती मौसम और समुद्र का बढ़ता तापमान जैसे कारक अनुकूल परिस्थितियां बना रहे हैं.

मृत्युंजय मोहपात्रा ने बताया कि अल नीनो वाले साल में अक्टूबर और नवंबर के दौरान चक्रवाती गतिविधियां देखने को मिलती हैं. समुद्र का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है. इन परिस्थितियों का असर केवल तटीय राज्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से देश के दूसरे हिस्सों के मौसम को भी प्रभावित कर सकता है. खासकर जब बंगाल की खाड़ी से उठे तूफान की नमी उत्तर-पश्चिम भारत में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के साथ मिलती है, तो दूर के इलाकों में भी बारिश की स्थिति बन सकती है.

28 अक्टूबर को चक्रवात अर्नब बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान के रूप में आंध्र प्रदेश के तट से टकराया था. सुबह करीब 2 बजे से 8 बजे के बीच हुए लैंडफॉल के दौरान हवा की रफ्तार 125 से 135 किलोमीटर प्रति घंटा थी, जबकि झोंकों की गति 150 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई थी. यह इस साल का पहला चक्रवात बताया गया. इसके महज पांच दिन बाद 3 नवंबर की सुबह मुरासु ने ओंगोल के पास तट पार कर लिया. दोनों तूफानों के लैंडफॉल वाले स्थानों के बीच सीधी दूरी करीब 268 किलोमीटर बताई गई है.

इस समय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है. IMD के अनुमान के मुताबिक, नवंबर और दिसंबर में भी इसका प्रभाव जारी रह सकता है. इतना ही नहीं, जनवरी से मार्च 2027 तक ताकतवर अल नीनो बने रहने की आशंका जताई गई है. विश्व मौसम संगठन (WMO) के आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो से प्रभावित प्रशांत महासागर के क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान जून में सामान्य से 1.6 डिग्री अधिक था. अगस्त में यह अंतर बढ़कर 2.5 डिग्री हो गया. अक्टूबर से दिसंबर के बीच तापमान सामान्य से करीब 3.7 डिग्री अधिक रहने का अनुमान है। यह 2015-16 में दर्ज 2.6 डिग्री के पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा हो सकता है.

अल नीनो का मतलब यह नहीं है कि बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की संख्या हर हाल में बढ़ जाएगी. हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक यह चक्रवातों के बनने की जगह और उनके रास्ते को प्रभावित कर सकता है. अल नीनो वाले वर्षों में कुछ तूफान भूमध्य रेखा के ज्यादा करीब बनते हैं, जिससे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटों की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है. सामान्य परिस्थितियों में कई चक्रवात ओडिशा और पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ते हैं.

इस बार समुद्र का लगातार गर्म बने रहना भी तूफानों के लिए अनुकूल परिस्थिति तैयार कर रहा है. आमतौर पर जब कोई बड़ा चक्रवात समुद्र से गुजरता है, तो वह गहराई का ठंडा पानी ऊपर ले आता है. इससे समुद्र की सतह का तापमान कम हो जाता है और तुरंत दूसरा तूफान बनने की संभावना घट सकती है. लेकिन अर्नब के बाद भी समुद्र की सतह गर्म बनी रही. समुद्र की गहराई में मौजूद गर्मी ने सतह को दोबारा गर्म करने में मदद की. इसके अलावा वातावरण में नमी ज्यादा रही और तूफान को कमजोर करने वाली विंड शियर भी कम थी.

IMD के मुताबिक, हिंद महासागर में भूमध्य रेखा के आसपास पश्चिमी और पूर्वी दोनों हिस्सों में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक है. इसी दौरान मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) नाम की मौसमी गतिविधि भी फेज-3 में है. यह स्थिति बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बादल बनने तथा चक्रवाती गतिविधियों के लिए अनुकूल मानी जाती है. IMD ने 29 अक्टूबर को ही अनुमान जताया था कि अंडमान सागर में बना कम दबाव का क्षेत्र 31 अक्टूबर तक डिप्रेशन में बदल सकता है और आंध्र प्रदेश के तट की ओर बढ़ सकता है। आगे चलकर यही सिस्टम मुरासु में विकसित हुआ.

इन तूफानों का असर केवल आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं रहा. अर्नब तट पार करने के बाद कमजोर हुआ और छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा की ओर बढ़ा. उसी समय उत्तर-पश्चिम भारत में एक पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय था. IMD के अनुसार, अर्नब के कमजोर पड़ने के बाद बचे कम दबाव वाले क्षेत्र की नमी और पश्चिमी विक्षोभ के आपस में मिलने से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल में बादल तथा बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती थीं. उत्तर बिहार में 30 अक्टूबर को कुछ स्थानों पर बेहद भारी बारिश का अनुमान भी जताया गया था. इससे पहले 25 अक्टूबर को सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में ओलावृष्टि हुई थी.

मुरासु के प्रभाव से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी दी गई है. छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी बहुत भारी बारिश हो सकती है, जबकि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ बारिश का अनुमान है. दूसरी ओर दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ज्यादातर मौसम शुष्क और धूप वाला रहने की संभावना जताई गई है. पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी हो सकती है.

नवंबर के मौसम को लेकर IMD का अनुमान है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल समेत दक्षिण भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. पूरे देश में भी इस महीने बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है. हिमालय की तलहटी के कुछ इलाकों को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में दिन का तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है. मध्य और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों को छोड़कर कई क्षेत्रों में रात का तापमान भी सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है. इसका मतलब है कि इस बार सर्दी की शुरुआत में देरी हो सकती है, IMD के मुताबिक, 11 नवंबर तक देश के किसी भी हिस्से में शीतलहर की संभावना नहीं जताई गई है…

बारिश की कमी पहले से ही चिंता बढ़ा रही है, 1 अक्टूबर से 28 अक्टूबर के बीच देश में सामान्य से 48 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई. ऐसे में लगातार दो चक्रवातों ने खासकर आंध्र प्रदेश के किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. अर्नब से हुए नुकसान का शुरुआती अनुमान 12 जिलों में करीब 4,700 करोड़ रुपये लगाया गया था. अब मुरासु के कारण खड़ी फसलों को दोबारा नुकसान पहुंचने की आशंका है. IMD ने तटीय आंध्र प्रदेश के किसानों को धान, अरहर, मक्का और कपास के खेतों से जल्द पानी निकालने तथा बारिश थमने तक रबी फसलों की बुवाई टालने की सलाह दी है.

इतिहास में भी कम अंतराल पर दो गंभीर चक्रवात आने के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं बहुत कम हुई हैं. 1891 से उपलब्ध रिकॉर्ड में अक्टूबर 1999 की घटना प्रमुख है. उस दौरान 17-18 अक्टूबर को दक्षिणी ओडिशा में एक बहुत गंभीर चक्रवात आया था और करीब 11 दिन बाद एक सुपर साइक्लोन ने दस्तक दी थी. आंध्र प्रदेश में नवंबर 2013 में भी हेलेन और लेहर नाम के दो चक्रवात लगभग एक सप्ताह के अंतराल पर पहुंचे थे.

जहां तक जलवायु परिवर्तन की भूमिका का सवाल है, किसी एक चक्रवात को सीधे इसके लिए जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा. हालांकि, कई शोध बताते हैं कि समुद्र का बढ़ता तापमान चक्रवातों को तेजी से ताकतवर बनने और लंबे समय तक टिके रहने के लिए अनुकूल परिस्थितियां दे सकता है. बंगाल की खाड़ी भी पिछले कई दशकों से लगातार गर्म हो रही है. ऐसे में अल नीनो, समुद्र का बढ़ता तापमान और मौसमी गतिविधियां मिलकर चक्रवातों के खतरे को किस तरह प्रभावित कर रही हैं, इस पर वैज्ञानिकों की नजर बनी हुई है.

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