उत्तर प्रदेश, वह राज्य जहाँ की सियासत अक्सर पूरे देश की राजनीतिक दिशा तय करती है। भले ही 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी कुछ वक्त बाकी हो, लेकिन लखनऊ से दिल्ली तक सियासी गलियारों में शह और मात का खेल पूरी तेजी से शुरू हो चुका है। एक तरफ अखिलेश यादव का ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला है, जिसने 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के विजय रथ को तगड़ी चुनौती दी, तो दूसरी तरफ भाजपा ने अब इसकी काट के लिए अपना ‘प्लान डी’ (दलित पॉलिटिक्स) तैयार कर लिया है। आज के इस विशेष विश्लेषण में, हम यूपी की राजनीति के इन नए समीकरणों और दांव-पेच को गहराई से समझेंगे।
हालिया राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो 2024 के लोकसभा चुनावों ने उत्तर प्रदेश की सियासी पिच को पूरी तरह बदल दिया। जहाँ भाजपा 2019 की तुलना में 33 सीटों पर सिमट गई, वहीं समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस अप्रत्याशित उलटफेर के पीछे सबसे बड़ा हाथ अखिलेश यादव के ‘PDA’ मंत्र का था। अखिलेश ने पारंपरिक ‘यादव-मुस्लिम’ समीकरण से आगे बढ़कर ‘गैर-यादव पिछड़ों’ और ‘बसपा से छिटके दलितों’ को अपने पाले में लाने में सफलता हासिल की। वर्तमान में, अखिलेश यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ‘SIR’ यानी वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के नाम पर फॉर्म-7 भरकर इन्हीं PDA मतदाताओं के नाम लिस्ट से कटवा रही है, ताकि 2027 की राह आसान हो सके।
अखिलेश के इस ‘PDA’ चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भाजपा ने अब अपनी सबसे बड़ी रणनीति ‘प्लान डी’ यानी ‘दलित पॉलिटिक्स’ पर दांव लगाया है। भाजपा का मानना है कि सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए दलित वोट बैंक सबसे अहम है। इस विस्तृत ‘प्लान डी’ के तहत, पार्टी ने 15 दलित महापुरुषों का एक वार्षिक कैलेंडर तैयार किया है, जिसमें कांशीराम, संत रविदास, बाबासाहेब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले जैसे दिग्गजों को शामिल किया गया है। भाजपा साल भर इन महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित कर दलित समाज के निचले तबके तक सीधा संवाद स्थापित करना चाहती है। खास बात यह है कि भाजपा अब मायावती पर सीधे हमले करने से बच रही है, ताकि बसपा समर्थकों में गलत संदेश न जाए और उन्हें धीरे-धीरे अपने साथ जोड़ा जा सके। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘हिंदुत्व’ कार्ड और ‘सुशासन’ का मॉडल भी भाजपा की रणनीति में एक महत्वपूर्ण फैक्टर बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 का चुनाव मुद्दों से कहीं ज्यादा ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की परीक्षा होगा। जहाँ समाजवादी पार्टी ‘संविधान बचाने’ और ‘जातिगत जनगणना’ जैसे मुद्दों को हवा दे रही है, वहीं भाजपा ‘विकास’, ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और अपने ‘प्लान डी’ के जरिए दलितों को यह एहसास दिलाना चाहती है कि उनकी विरासत भाजपा के साथ ही सुरक्षित है। वर्तमान जनमत हालांकि मौन है, लेकिन वह महंगाई, रोजगार और प्रशासन के पैमानों पर हर पार्टी को तौल रहा है। क्या अखिलेश का PDA भाजपा के हिंदुत्व और दलित आउटरीच को पछाड़ पाएगा, या भाजपा का ‘प्लान डी’ सपा के विजय रथ को रोकने में सफल होगा? यह देखना दिलचस्प होगा।
नतीजा जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में 2027 की यह राजनीतिक जंग सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि उत्तर भारत की राजनीति का नया दिशा-निर्देशक होगी। भाजपा की हैट्रिक की कोशिश और सपा की सत्ता वापसी की छटपटाहट के बीच, आने वाले समय में जनता ही असली फैसला सुनाएगी।









