उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी अभी से तेज हो गई है। खासकर महिला वोट को लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला बढ़ता दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी की ओर से महिलाओं के लिए हर साल 40 हजार रुपये की आर्थिक मदद के ऐलान के बाद बीजेपी ने इस पर हमला बोला है। यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव के साथ तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि चेहरे अलग हैं, लेकिन राजनीति का तरीका एक जैसा है।
केशव मौर्य ने बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली के चुनावी नतीजों का हवाला देते हुए दावा किया कि अगला नंबर समाजवादी पार्टी का है और 2027 में यूपी की जनता उसे भी नकार देगी। यानी केशव का हमला सिर्फ अखिलेश के वादे पर नहीं है। इसके जरिए बीजेपी ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि चुनावी घोषणाओं से ज्यादा जरूरी उनका जमीन पर लागू होना है।
महिला वोट को लेकर इतनी जल्दी क्यों शुरू हुई होड़?
सवाल ये है कि आखिर महिला वोट को लेकर बीजेपी और सपा में इतनी जल्दी होड़ क्यों शुरू हो गई है?
दरअसल, दोनों पार्टियों को पता है कि यूपी में महिलाओं की चुनावी हिस्सेदारी अब किसी भी चुनावी रणनीति को प्रभावित करने की स्थिति में है। 2022 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा था। वहीं 2024 में उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या देश में सबसे ज्यादा रही।
यानी 2027 की लड़ाई में आधी आबादी सिर्फ एक सामाजिक समूह नहीं, बल्कि ऐसा वोट बैंक है जो कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बदल सकता है।
2022 में पुरुषों से ज्यादा रहा महिलाओं का मतदान
यूपी की राजनीति लंबे समय तक जातीय और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी और उनका महत्व लगातार बढ़ा है।
2022 में यूपी में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 62.24 फीसदी रहा, जबकि पुरुषों का मतदान प्रतिशत 59.56 फीसदी था। यही वजह है कि अब राजनीतिक दल महिला वोट को सिर्फ किसी जातीय समीकरण का हिस्सा मानकर नहीं चल रहे हैं। महिलाओं के लिए अलग योजनाएं, अलग संदेश और अलग राजनीतिक नैरेटिव तैयार किए जा रहे हैं।
योगी सरकार का महिला वोट पर फोकस
इसी तस्वीर में अब बीजेपी की रणनीति को समझना जरूरी है। योगी सरकार ने 26 अगस्त को ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा’ शुरू की। इसके तहत 60 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं को यूपी रोडवेज की बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई है।
सरकार इसे बुजुर्ग महिलाओं की सुविधा, सम्मान और आत्मनिर्भरता से जोड़ रही है। यानी बीजेपी का ये कदम सीधे एक खास आयु वर्ग की जरूरत को टारगेट करता है।
बुजुर्ग महिलाओं के लिए यात्रा का खर्च कम करना और उन्हें अपने मायके, रिश्तेदारों, धार्मिक स्थलों या दूसरे जरूरी कामों के लिए ज्यादा स्वतंत्रता देना इसका सीधा असर है।
युवा छात्राओं पर भी बीजेपी की नजर
लेकिन बीजेपी की महिला रणनीति सिर्फ बुजुर्ग महिलाओं तक सीमित नहीं है। रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना के तहत मेधावी छात्राओं को मुफ्त स्कूटी देने की तैयारी भी आगे बढ़ चुकी है।
2025-26 में स्नातक की टॉप 5 फीसदी मेधावी छात्राओं को इसका लाभ देने का प्रावधान है। यानी यहां फोकस युवा और उच्च शिक्षा से जुड़ी छात्राओं पर है।
इस तरह बीजेपी का मॉडल अलग-अलग उम्र की महिलाओं तक अलग-अलग योजनाओं के जरिए पहुंच बनाने की कोशिश करता दिखाई देता है।
सपा का 40 हजार रुपये का दांव
अब समाजवादी पार्टी की रणनीति देखिए। योगी सरकार की मुफ्त बस यात्रा योजना के ऐलान के कुछ ही समय बाद समाजवादी पार्टी ने ‘स्त्री सम्मान समृद्धि योजना’ का ऐलान किया।
डिंपल यादव ने अखिलेश यादव की मौजूदगी में घोषणा की कि अगर 2027 में सपा की सरकार बनती है तो गरीब महिलाओं को हर साल 40 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।
पार्टी ने कहा है कि इस योजना का मकसद महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करना और शिक्षा, रोजगार तथा आत्मनिर्भरता से जोड़ना है।
यानी सपा का मॉडल सीधे आर्थिक मदद पर ज्यादा जोर देता है।
महिला वोट से PDA को जोड़ने की कोशिश
लेकिन यहां सिर्फ 40 हजार रुपये का वादा ही कहानी नहीं है। सपा ने अपने पुराने PDA सामाजिक समीकरण को महिला वोट से जोड़ने की कोशिश की है।
पार्टी ने PDA के ‘A’ को अब ‘आधी आबादी’ से जोड़ते हुए महिला मतदाताओं को अपने सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा बनाने का संदेश दिया है।
यानी 2024 में जिस PDA को सपा ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण के तौर पर आगे रखा था, 2027 में उसमें महिला वोट को जोड़कर उसका दायरा बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है।
महिला नेताओं की मौजूदगी से भी बड़ा संदेश
सपा के ऐलान के वक्त डिंपल यादव के साथ इकरा हसन, प्रिया सरोज और दूसरी महिला नेताओं की मौजूदगी भी राजनीतिक संदेश का हिस्सा मानी जा सकती है।
यानी पार्टी महिला मुद्दे को सिर्फ आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखना चाहती। वह इसे प्रतिनिधित्व और सामाजिक भागीदारी से भी जोड़ रही है।
सपा की कोशिश ये है कि महिला वोट को अलग से जोड़ने के बजाय उसे अपने व्यापक सामाजिक समीकरण का हिस्सा बनाया जाए।
BJP और SP की रणनीति में क्या अंतर?
यहीं बीजेपी और सपा की रणनीति में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।
बीजेपी की तरफ से सरकारी योजनाओं और सुविधाओं के जरिए महिला तक पहुंचने की कोशिश है। वहीं सपा आर्थिक मदद, प्रतिनिधित्व और PDA के विस्तार के जरिए महिला वोट को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
यानी एक तरफ सरकार अपनी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, तो दूसरी तरफ सपा आर्थिक सहायता के वादे के जरिए महिलाओं के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश में है।
क्या घोषणाएं वोट में बदल पाएंगी?
अब सबसे अहम सवाल—क्या ये योजनाएं और वादे 2027 में वोट में बदल पाएंगे?
क्योंकि महिला मतदाता को एक जैसा समूह मानना दोनों पार्टियों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। एक युवा छात्रा के लिए शिक्षा, रोजगार और सुरक्षित आवागमन ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। एक बुजुर्ग महिला के लिए मुफ्त यात्रा और सामाजिक सुरक्षा ज्यादा अहम हो सकती है।
वहीं गरीब परिवार की महिला के लिए सीधे आर्थिक सहयोग बड़ा मुद्दा बन सकता है। कामकाजी महिला के लिए रोजगार, सुरक्षा, सुविधाएं और काम का माहौल ज्यादा मायने रख सकता है।
इसलिए चुनाव में सिर्फ ये देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किसने कितना बड़ा वादा किया। सवाल ये होगा कि किस पार्टी का संदेश महिला मतदाता की वास्तविक जरूरत से जुड़ता है और किसके वादे पर भरोसा बनता है।
केशव मौर्य के हमले के क्या सियासी मायने?
अब वापस आते हैं केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर। उनका हमला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बीजेपी सपा की इस घोषणा को सिर्फ महिला कल्याण के वादे के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसे 2027 के चुनावी नैरेटिव की शुरुआत मान रही है।
केशव मौर्य का संदेश साफ है—विपक्ष बड़े-बड़े वादे कर सकता है, लेकिन बीजेपी अपने शासन में लागू योजनाओं को सामने रखकर मुकाबला करेगी।
दूसरी तरफ सपा के लिए चुनौती ये है कि 40 हजार रुपये का वादा सिर्फ एक चुनावी घोषणा बनकर न रह जाए। उसे इसे महिला सम्मान, आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपने PDA नैरेटिव के साथ जोड़कर एक बड़ा राजनीतिक संदेश बनाना होगा।
2027 में महिला वोट बनेगा बड़ा फैक्टर?
पूरी तस्वीर को जोड़कर देखें तो 2027 का चुनाव सिर्फ पुराने जातीय समीकरणों का मुकाबला नहीं रहने वाला। जाति का गणित अपनी जगह रहेगा, PDA अपनी जगह रहेगा और बीजेपी का अपना सामाजिक आधार अपनी जगह रहेगा।
लेकिन इनके बीच महिला वोट एक ऐसा फैक्टर बन चुका है जिसे कोई भी बड़ी पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती।
बीजेपी अलग-अलग आयु वर्ग की महिलाओं तक योजनाओं के जरिए पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। सपा अपने PDA के साथ आधी आबादी को जोड़ने का प्रयास कर रही है। और इसी के बीच केशव मौर्य का हमला बता रहा है कि महिला वोट का ये मुकाबला अब राजनीतिक बयानबाजी में भी उतर चुका है।
यानी 2027 में सवाल सिर्फ ये नहीं होगा कि किसका जातीय समीकरण बड़ा है। सवाल ये भी होगा कि आधी आबादी किसके साथ खड़ी होती है, किसकी योजना ज्यादा भरोसा पैदा करती है और किसका वादा ज्यादा असर छोड़ता है।
सबसे बड़ी बात—महिला मतदाता अपने वोट के जरिए किसे सत्ता की तरफ ले जाती है। यही वजह है कि 2027 की यूपी सियासत में महिला वोट अब सिर्फ ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि चुनावी मुकाबले की दिशा बदलने वाला बड़ा फैक्टर बनता दिखाई दे रहा है।