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US-ईरान की जंग फिर से शुरू, अब होर्मुज और तेल बाजार पर नजर, क्यों अगले 40 दिन भारत के लिए काफी अहम?

US-Iran War Impact

US-Iran सीजफायर टूटने के बाद होर्मुज स्ट्रेट और तेल बाजार पर संकट बढ़ा, जिसका सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है. अमेरिका और ईरान के बीच करीब तीन हफ्ते पहले हुआ महत्वपूर्ण सीजफायर अब पूरी तरह से टूट चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि यह संघर्षविराम अब खत्म हो गया है. जिसके बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए हैं. जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है. इस टकराव का असर अब सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें एक बार फिर वैश्विक तेल बाजार और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते ‘होर्मुज स्ट्रेट’ पर टिक गई हैं. क्योंकि यहीं से तय होगा कि आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी. भारत के लिए भी अगला डेढ़ महीना यानी करीब 40 दिन बेहद संवेदनशील और अहम होने वाले हैं. क्योंकि इसका सीधा असर तेल की कीमतों से लेकर रुपये की चाल, घरेलू रसोई गैस, शेयर बाजार और आगामी त्योहारी सीजन पर पड़ सकता है.

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78 डॉलर के पार निकला ब्रेंट क्रूड, क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल

सीजफायर के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड गिरकर 69 से 70 डॉलर प्रति बैरल के आरामदायक स्तर पर आ गया था. लेकिन दोनों देशों के बीच दोबारा युद्ध भड़कने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 7 फीसदी से ज्यादा का जोरदार उछाल आया है और यह फिर से 78 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है. भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करती है. हालांकि अभी देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं और दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रेंट क्रूड 75 से 78 डॉलर के बीच लंबे समय तक टिका रहा, तो अगले दो से चार हफ्तों में तेल कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बेहद बढ़ जाएगा. यदि यह तनाव लंबा खिंचा और कीमतें 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचीं, तो आम आदमी को महंगे ईंधन का बड़ा झटका लग सकता है.

‘होर्मुज स्ट्रेट’ क्यों बन गया है सबसे बड़ा सिरदर्द

पूरी दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20 फीसदी हिस्सा अकेले होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है, यही वजह है कि इस समुद्री रास्ते पर बढ़ा तनाव पूरी दुनिया की चिंता बन गया है. भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति बदलते हुए खाड़ी देशों पर निर्भरता कम की है, जिसके चलते अब भारत का करीब 70 फीसदी कच्चा तेल होर्मुज के बाहर के वैकल्पिक स्रोतों से आ रहा है, जबकि पहले यह हिस्सा करीब 55 फीसदी था. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक असली चिंता एलपीजी और एलएनजी की सप्लाई को लेकर बनी हुई है, क्योंकि इसकी आपूर्ति के लिए भारत आज भी काफी हद तक खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है. यदि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो देश में रसोई गैस, सीएनजी और पीएनजी की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है. इसके अलावा, जहाजों का समुद्री बीमा और शिपिंग की लागत बढ़ने से अन्य आयातित सामान भी महंगे हो जाएंगे.

रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया और त्योहारों से पहले महंगाई की आहट

महंगे कच्चे तेल का सीधा नुकसान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और देश की मुद्रा रुपये को उठाना पड़ता है, क्योंकि भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इसी वजह से रुपये पर दबाव बहुत बढ़ गया है और रुपया करीब 60 पैसे टूटकर 95.56 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ है, जो लगभग एक महीने का सबसे कमजोर स्तर है. कमजोर रुपये का सीधा मतलब है कि भारत के लिए विदेशों से आने वाला हर सामान जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल, मशीनरी और अन्य चीजें महंगी हो जाएंगी, जिसका असर धीरे-धीरे चौतरफा महंगाई के रूप में दिखाई देगा. भारत में अगस्त और सितंबर से प्रमुख त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है, जब बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग अपने चरम पर होती है. यदि उस समय तक तेल महंगा रहा और रुपया कमजोर बना रहा, तो त्योहारों की खुशियों से पहले महंगाई का दबाव आम आदमी का बजट बिगाड़ सकता है.

शेयर बाजार में हड़कंप और निवेशकों की भारी चपत

भू-राजनीतिक अनिश्चितता का सबसे पहला और तात्कालिक शिकार शेयर बाजार बनता है, जिसका असर भारतीय बाजार में भी साफ दिखाई दे चुका है. तनाव की खबर आते ही सेंसेक्स 1,677 अंक भरभराकर टूट गया, जिससे महज कुछ ही समय में निवेशकों की लगभग 9 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई. इसके साथ ही बाजार में उतार-चढ़ाव को दर्शाने वाला इंडिया वीआईएक्स सूचकांक भी करीब 30 फीसदी तक उछल गया. बाजार विश्लेषकों का कहना है कि अगले 40 दिनों के दौरान शेयर बाजार मुख्य रूप से तीन बड़े कारकों पर नजर रखेगा, जिसमें पहला अमेरिका-ईरान तनाव की दिशा है, दूसरा जुलाई में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों पर लिया जाने वाला फैसला है, और तीसरा अगस्त के मध्य तक दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू होने या पूरी तरह टूटने की स्थिति है. अगर इन मोर्चों पर राहत नहीं मिली तो बाजार में गिरावट और उतार-चढ़ाव का दौर और बढ़ सकता है.

भारत के लिए क्यों अहम हैं अगले 40 दिन

भारत ने तेल आयात के अपने स्रोतों को बढ़ाकर अपनी स्थिति को पहले के मुकाबले मजबूत जरूर किया है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों के कारण देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. यदि आगामी दिनों में कूटनीतिक प्रयासों से तनाव कम होता है, होर्मुज स्ट्रेट खुला रहता है और कच्चा तेल फिर से 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आता है, तो भारत को बड़ी राहत मिल सकती है. इसके विपरीत, अगर यह जंग लंबी खिंचती है, वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होती है और कच्चे तेल का भाव 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना रहता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा. ऐसी स्थिति में रसोई गैस, सीएनजी, चौतरफा महंगाई, रुपये की साख और शेयर बाजार हर मोर्चे पर दबाव बढ़ जाएगा, जिससे साफ़ है कि पश्चिम एशिया का यह टकराव भले ही हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन अगले 40 दिन यह तय करेंगे कि भारत के आम आदमी की जेब पर कितना बोझ पड़ेगा.

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