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वाराणसी: आस्था और श्रमदान का संगम, दशाश्वमेध घाट पर नमामि गंगे का बड़ा स्वच्छता अभियान

वाराणसी आस्था और श्रमदान का संगम

मां गंगा के प्रति अटूट श्रद्धा और पर्यावरण संरक्षण की भावना को सशक्त रूप देते हुए वाराणसी में नमामि गंगे अभियान के तहत दशाश्वमेध घाट पर एक विशेष स्वच्छता जागरुकता एवं श्रमदान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान स्वयंसेवकों ने एकजुट होकर घाट की सफाई की और गंगा निर्मलीकरण का सामूहिक संकल्प दोहराया। यह पहल गंगा को प्लास्टिक मुक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यक्रम की शुरुआत अत्यंत ही धार्मिक माहौल में हुई, जहां राष्ट्रध्वज की उपस्थिति में माँ गंगा की विधि-विधान से आरती की गई। आरती के बाद, नमामि गंगे के स्वयंसेवकों ने तुरंत ही श्रमदान शुरू कर दिया। उन्होंने पूर्ण निष्ठा के साथ घाट पर बिखरी हुई पूजन सामग्री, प्लास्टिक की थैलियों, डिस्पोजेबल वस्तुओं और खाली बोतलों को एकत्रित किया। अंत में, एकत्रित किए गए कचरे को नगर निगम के माध्यम से उचित निपटान के लिए भेजा गया ताकि घाट की स्वच्छता सुनिश्चित की जा सके।

इस अवसर पर, उपस्थित आमजनों और स्वयंसेवकों को सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त गंगा का संकल्प भी दिलाया गया। नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक और नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एम्बेसडर, राजेश शुक्ला ने गंगा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, “माँ गंगा केवल काशी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की जीवनरेखा हैं। यह विश्व की एकमात्र ऐसी नदी हैं जिसका धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व अद्वितीय है। इसकी स्वच्छता और संरक्षण हम सभी का सामूहिक दायित्व है।”

स्वयंसेवकों ने इस दौरान यह चिंता भी व्यक्त की कि प्लास्टिक कचरा न केवल गंगा के जल को प्रदूषित कर रहा है, बल्कि यह जलीय जीवों के अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। उन्होंने विशेष रूप से श्रद्धालुओं और नागरिकों से अपील की कि वे पूजन के बाद फूल-माला, प्लास्टिक थैलियां या डिस्पोजेबल सामग्री नदी में प्रवाहित न करें और घाटों पर गंदगी फैलाने से बचें। इस कार्यक्रम में महानगर प्रभारी पुष्पलता वर्मा, वेद प्रकाश तिवारी, अर्चना तिवारी, जगन, संजना शर्मा सहित अनेक स्वयंसेवक उपस्थित रहे।

गंगा को स्वच्छ और निर्मल रखने के लिए सरकारी अभियानों के साथ-साथ जनभागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। नमामि गंगे का यह श्रमदान अभियान दिखाता है कि सामूहिक प्रयास से ही हम अपनी जीवनदायिनी नदी को बचा सकते हैं।