पेपर लीक का दर्द सबसे ज्यादा उस छात्र को होता है, जिसने दिन-रात मेहनत करके परीक्षा दी हो। इसलिए जब पेपर लीक का मुद्दा उठा, तो पूरे देश ने छात्रों के साथ सहानुभूति जताई। लेकिन कुछ ही दिनों में सवाल उठने लगे कि क्या यह आंदोलन सिर्फ छात्रों के भविष्य के लिए था, या फिर कुछ लोग इसे सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाना चाहते थे?
अगर मकसद सिर्फ पेपर लीक के दोषियों को सजा दिलाना था, तो फिर संसद की तरफ मार्च क्यों? प्रधानमंत्री आवास का घेराव क्यों? प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र नारे और गालियां क्यों? क्या इन सबका पेपर लीक से कोई सीधा संबंध था? ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने आए। उन्होंने देश के छात्रों को सीधे संबोधित करते हुए भरोसा दिया कि पेपर लीक करने वालों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जाएगा। उन्होंने नए और सख्त कानून लाने की बात कही, संसद में चर्चा का भरोसा दिया और साफ संदेश दिया कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर सरकार और कड़ी कार्रवाई करेगी।
प्रधानमंत्री के इस संदेश के कुछ ही घंटों बाद घटनाक्रम तेजी से बदला। दिल्ली हाईकोर्ट ने पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर दिया। दूसरी ओर, लंबे समय से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक ने भी अपना अनशन समाप्त कर दिया। प्रधानमंत्री ने उनसे स्वास्थ्य का ध्यान रखने की अपील की और उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। इसके बाद आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक माने जा रहे अनशन का खत्म होना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश बन गया।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। दिल्ली पुलिस ने पाकिस्तान से संचालित 480 सोशल मीडिया अकाउंट्स की पहचान कर उन्हें ब्लॉक किया, जिन पर देश में भ्रम फैलाने और माहौल भड़काने का आरोप है। पुलिस ने छात्रों और युवाओं से अपील की कि वे विदेशी प्रोपेगेंडा और अफवाहों का हिस्सा न बनें। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब देश के अंदर कोई संवेदनशील मुद्दा उठता है, तो क्या बाहरी ताकतें भी उसे हवा देने की कोशिश करती हैं?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध और अराजकता में फर्क होता है। यदि छात्रों के नाम पर आंदोलन हो और उसका केंद्र अचानक पेपर लीक से हटकर प्रधानमंत्री, संसद और सरकार को निशाना बन जाए, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर असली एजेंडा क्या था?
सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन छात्रों के भविष्य को राजनीतिक मोहरा बनाना किसी भी लोकतंत्र के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। अब जब सरकार ने कानून सख्त करने, संसद में चर्चा कराने और तेज न्यायिक प्रक्रिया की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, तो उम्मीद यही है कि बहस अब राजनीति से आगे बढ़कर समाधान पर केंद्रित होगी।
देश का युवा न नारों से अपना भविष्य बनाएगा और न ही सियासी टकराव से। उसे चाहिए निष्पक्ष परीक्षा, कड़ी सजा, पारदर्शी व्यवस्था और भरोसेमंद सिस्टम। यही असली जीत होगी, और यही उस हर छात्र के साथ न्याय होगा जिसने ईमानदारी से मेहनत की है।