US-Saudi Nuclear Deal: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से जिस सिविलियन न्यूक्लियर समझौते का इंतजार था, वह आखिरकार साइन हो गया। लेकिन डील पर हस्ताक्षर होने के महज 24 घंटे के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा बयान दिया, जिससे इस समझौते का भविष्य अनिश्चित हो गया। ट्रंप ने साफ कर दिया कि अगर सऊदी अरब अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होकर इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य नहीं करता, तो यह परमाणु समझौता आगे नहीं बढ़ेगा।
क्या थी अमेरिका-सऊदी परमाणु डील?
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 30 साल का सिविलियन न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट हुआ है। यह अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act) की धारा 123 के तहत तैयार किया गया समझौता है।
इस समझौते के तहत:
- अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने में मदद करेंगी।
- अमेरिका परमाणु ईंधन आपूर्ति और तकनीकी सहयोग देगा।
- वेस्टिंगहाउस जैसी अमेरिकी कंपनियों को परियोजनाओं में प्राथमिकता मिलेगी।
- डील का उद्देश्य सऊदी अरब की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करना और घरेलू तेल की खपत घटाकर निर्यात बढ़ाना है।
- साथ ही यह समझौता सऊदी के परमाणु क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को सीमित करने की रणनीति भी माना जा रहा है।
यूरेनियम एनरिचमेंट पर क्यों मचा विवाद?
इस समझौते का सबसे संवेदनशील हिस्सा यूरेनियम एनरिचमेंट (Uranium Enrichment) है।
अब तक अमेरिका जिन देशों के साथ परमाणु समझौते करता रहा है, उनमें आमतौर पर यूरेनियम संवर्धन और इस्तेमाल किए गए ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण (Reprocessing) पर रोक लगाई जाती थी। लेकिन सऊदी अरब ने इस शर्त को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
नई व्यवस्था के तहत:
- अमेरिका और सऊदी दो साल तक संयुक्त अध्ययन करेंगे।
- यदि अध्ययन में घरेलू एनरिचमेंट को व्यावसायिक रूप से लाभकारी माना गया, तो अमेरिकी कंपनियां “ब्लैक बॉक्स” मॉडल के तहत प्लांट बना सकती हैं।
- इस मॉडल में संवेदनशील तकनीक सऊदी अरब को सीधे नहीं दी जाएगी।
- यदि अमेरिका बाद में अनुमति नहीं देता, तो सऊदी 10 वर्षों तक किसी अन्य देश के साथ एनरिचमेंट परियोजना शुरू नहीं कर सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान भविष्य में मध्य-पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ाने का कारण बन सकता है।
ट्रंप ने अचानक क्यों जोड़ दी नई शर्त?
डील पर हस्ताक्षर होने के अगले ही दिन डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह समझौता तभी लागू होगा, जब सऊदी अरब अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होकर इजरायल के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित करेगा।
व्हाइट हाउस की ओर से भी स्पष्ट किया गया कि यदि सऊदी इस समझौते का हिस्सा नहीं बनता, तो परमाणु डील आगे नहीं बढ़ेगी।
माना जा रहा है कि ट्रंप इस समझौते को मध्य-पूर्व में इजरायल और अरब देशों के बीच संबंध सामान्य बनाने की अपनी व्यापक रणनीति से जोड़ना चाहते हैं।
अब्राहम एकॉर्ड्स क्या हैं?
अब्राहम एकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में शुरू हुआ समझौता है, जिसके तहत संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और कुछ अन्य देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।
अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि सऊदी अरब भी इस समझौते में शामिल हो, क्योंकि इससे मध्य-पूर्व की रणनीतिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सऊदी अरब की क्या है स्थिति?
सऊदी अरब लगातार कहता रहा है कि वह इजरायल के साथ संबंध सामान्य तभी करेगा, जब फिलिस्तीन के लिए स्वतंत्र राज्य बनाने की दिशा में ठोस प्रगति होगी।
दूसरी ओर, इजरायल की मौजूदा सरकार फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे पर सहमत नहीं दिख रही है। ऐसे में ट्रंप की नई शर्त सऊदी के लिए राजनीतिक रूप से काफी मुश्किल मानी जा रही है।
अब आगे क्या होगा?
यह समझौता अब अमेरिकी कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए जाएगा, जहां इस पर करीब 90 दिनों तक विचार किया जाएगा।
हालांकि अंतिम निर्णय अमेरिकी प्रशासन के पास रहेगा, लेकिन ट्रंप की नई शर्त के बाद इस डील का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी अरब अब्राहम एकॉर्ड्स को लेकर क्या फैसला करता है।