दुनिया की अर्थव्यवस्था में दशकों से अमेरिकी डॉलर का दबदबा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार से लेकर तेल की खरीद-बिक्री, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक वित्तीय लेनदेन तक डॉलर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। लेकिन अब BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा तेज हो गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया धीरे-धीरे अमेरिकी डॉलर से दूर जा रही है?
हालांकि, तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। BRICS फिलहाल डॉलर को पूरी तरह खत्म करने या उसकी जगह तुरंत कोई नई साझा करेंसी लाने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है। इसके बजाय समूह का फोकस स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, सीमा पार भुगतान को आसान बनाने और ऐसी वित्तीय व्यवस्था तैयार करने पर है, जिससे सदस्य देशों को हर लेनदेन के लिए डॉलर पर निर्भर न रहना पड़े। 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन में भी इसी व्यावहारिक रास्ते पर जोर दिया गया।
आखिर डॉलर का दबदबा इतना बड़ा क्यों है?
अमेरिकी डॉलर लंबे समय से दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा डॉलर में रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय बाजारों में भी डॉलर का व्यापक इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह है कि अगर दो देशों के बीच ऐसा व्यापार हो रहा है, जिसमें दोनों की अपनी-अपनी मुद्राएं अलग हैं, तो कई मामलों में डॉलर एक मध्यवर्ती मुद्रा के तौर पर काम करता है। यही वजह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की भूमिका इतनी मजबूत बनी हुई है।
लेकिन रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक तनाव जैसे घटनाक्रमों ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर इतनी अधिक निर्भरता उनके लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
BRICS क्यों कम करना चाहता है डॉलर पर निर्भरता?
BRICS में अब 11 सदस्य देश शामिल हैं और इसका आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पहले के मुकाबले काफी बढ़ चुका है। समूह के कई सदस्य देश चाहते हैं कि उनके बीच होने वाले व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़े। उदाहरण के तौर पर भारत और रूस के बीच कारोबार में रुपये और रूबल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसी तरह चीन और रूस भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि देशों को हर लेनदेन के लिए पहले अपनी मुद्रा को डॉलर में बदलने और फिर दूसरी मुद्रा में बदलने की जरूरत कम पड़े। इससे लेनदेन की लागत और कुछ मामलों में डॉलर से जुड़े जोखिम को कम किया जा सकता है।
BRICS की नई रणनीति क्या है?
BRICS की मौजूदा रणनीति को समझना बेहद जरूरी है। समूह फिलहाल किसी एक नई करेंसी को डॉलर के विकल्प के तौर पर लागू करने के बजाय भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। 2026 के न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन में सदस्य देशों की मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने तथा सीमा-पार भुगतान को अधिक आसान और सुरक्षित बनाने की बात कही गई है। BRICS Payment Task Force के जरिए सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर भी काम हो रहा है।यानी BRICS का तत्काल लक्ष्य डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि ऐसा विकल्प तैयार करना है जिसमें सदस्य देश जरूरत पड़ने पर डॉलर के बिना भी आपस में कारोबार कर सकें।
क्या BRICS अपनी अलग करेंसी लाएगा?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है। कई बार BRICS की साझा करेंसी को लेकर खबरें और अटकलें सामने आती रही हैं। लेकिन अभी तक समूह ने ऐसी कोई साझा करेंसी लॉन्च नहीं की है। इसके पीछे कई व्यावहारिक मुश्किलें हैं। BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाएं, मौद्रिक नीतियां, महंगाई दर, ब्याज दरें और आर्थिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं। भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दूसरे सदस्य देशों के लिए एक ही मुद्रा और एक जैसी मौद्रिक नीति पर सहमत होना आसान नहीं होगा। इसीलिए फिलहाल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान व्यवस्था को मजबूत करना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है।
भारत के लिए इसमें क्या फायदा है?
भारत के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भारतीय कंपनियों और बैंकों को कुछ देशों के साथ कारोबार में डॉलर पर कम निर्भर रहना पड़े। भारत अपनी डिजिटल भुगतान क्षमता और UPI जैसे मॉडल को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दे रहा है। BRICS के भीतर डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की कोशिश सफल होती है तो भविष्य में सीमा-पार भुगतान ज्यादा तेज और आसान हो सकता है। इसके अलावा भारत के लिए यह अपनी तकनीकी क्षमता और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को ग्लोबल साउथ के देशों के सामने रखने का भी मौका है।
रूस और चीन क्यों चाहते हैं बदलाव?
रूस के लिए डॉलर से दूरी की कोशिश का एक बड़ा कारण पश्चिमी प्रतिबंध हैं। रूस की अर्थव्यवस्था लंबे समय से डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों का सामना कर रही है। ऐसे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार उसके लिए रणनीतिक महत्व रखता है।चीन भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी मुद्रा युआन की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। चीन की अर्थव्यवस्था और उसका वैश्विक व्यापार नेटवर्क बड़ा होने के कारण युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा इस्तेमाल कराने की उसकी कोशिश स्वाभाविक है। हालांकि, भारत का नजरिया चीन और रूस से अलग है। नई दिल्ली किसी एक मुद्रा या किसी एक देश के प्रभुत्व को दूसरे से बदलने के बजाय अधिक विविध और संतुलित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था की वकालत करती है।
क्या डॉलर का दबदबा सच में खत्म हो रहा है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में से एक है। BRICS के भीतर भी सदस्य देशों के बीच व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर से जुड़ी व्यवस्था पर निर्भर है। इसके अलावा वैश्विक वित्तीय बाजारों में डॉलर की गहराई और अमेरिकी वित्तीय संस्थानों का प्रभाव अभी भी बहुत बड़ा है। यही वजह है कि BRICS की मौजूदा रणनीति को ‘डॉलर खत्म करने’ के बजाय ‘डॉलर पर निर्भरता कम करने’ की कोशिश के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
BRICS के सामने क्या चुनौतियां हैं?
BRICS का विस्तार होने के साथ समूह की ताकत बढ़ी है, लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी बढ़ी हैं। अलग-अलग सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं। भारत और चीन के बीच सीमा और व्यापार से जुड़े मतभेद हैं। ईरान और UAE जैसे देशों के क्षेत्रीय हित भी अलग हैं। रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव का असर भी समूह की राजनीति पर पड़ता है। ऐसे में सभी सदस्य देशों को एक साझा वित्तीय रणनीति पर सहमत कराना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि BRICS धीरे-धीरे और व्यावहारिक तरीके से आगे बढ़ रहा है।
तो क्या बदलने वाली है दुनिया की करेंसी व्यवस्था?
सबसे अहम बात यही है कि दुनिया में फिलहाल डॉलर की जगह लेने वाली कोई एक करेंसी तैयार नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के विकल्प जरूर तलाश रहे हैं। BRICS स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और स्थानीय मुद्रा आधारित वित्तपोषण को बढ़ावा दे रहा है। अगर आने वाले वर्षों में इन व्यवस्थाओं का विस्तार होता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी पर दबाव पड़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर कल या अगले कुछ वर्षों में खत्म हो जाएगा। बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है जहां सिर्फ एक मुद्रा पर निर्भरता कम हो और कई मुद्राएं अलग-अलग क्षेत्रों और व्यापारिक जरूरतों के हिसाब से महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
यानी BRICS की असली कहानी फिलहाल ‘डॉलर के अंत’ की नहीं, बल्कि ‘डॉलर के विकल्प बढ़ाने’ की है।