परिवर्तिनी एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी पर जगत के पालनहार भगवान विष्णु अपनी शयन मुद्रा में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी या पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा का विधान है। व्रत रखने वाले भक्तों को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और साफ वस्त्र पहनने चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर उनकी षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान फल, फूल, मिष्ठान और तुलसी दल अर्पित करना बेहद शुभ माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था जो अत्यंत पराक्रमी और दानी था। उसने अपने बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि के यज्ञ से घबराकर इंद्रदेव और अन्य देवता भगवान विष्णु के पास सहायता मांगने पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और बौने ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचे।
वामन भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि ने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने अपने दो पगों में ही पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के आगे झुका दिया और तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहा। बलि की इस दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया और वरदान दिया कि वे क्षीरसागर में उनके साथ रहेंगे। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं।
व्रत के नियम:
परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने वालों को कुछ खास नियमों का पालन करना चाहिए। इस दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है। व्रत में फलाहार किया जा सकता है या फिर अपनी क्षमता के अनुसार एक समय भोजन किया जा सकता है। पूजा के समय मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार नहीं लाने चाहिए और भगवान का ध्यान करना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना और भगवान विष्णु के भजनों का पाठ करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। द्वादशी तिथि के दिन किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए।