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69000 शिक्षक भर्ती: आरक्षण घोटाले पर उबाल, डिप्टी सीएम कार्यालय के सामने क्यों हुआ बड़ा प्रदर्शन?

उत्तर प्रदेश शिक्षक भर्ती विवाद गहराया

उत्तर प्रदेश में 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती का विवाद छह साल बाद भी थमा नहीं है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी लगातार आरक्षण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं, जिसे वे ‘आरक्षण घोटाला’ कह रहे हैं। हाल ही में, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने अपनी मांगों को लेकर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के आवास/कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया, जिससे राज्य में यह संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है।

यह विवाद साल 2018 में शुरू हुई 69,000 सहायक शिक्षक (जूनियर बेसिक स्कूलों के लिए) भर्ती से जुड़ा है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में बेसिक शिक्षा नियम 1981 और आरक्षण नियम 1994 का गंभीर उल्लंघन हुआ है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ओबीसी कोटे (27%) में भारी कटौती करके केवल 3.86% आरक्षण दिया गया, जबकि एससी कोटे (21%) में भी मात्र 16.2% ही लागू किया गया। कुल मिलाकर, आरोप है कि लगभग 15,000 से 19,000 आरक्षित पद गलत तरीके से सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को आवंटित कर दिए गए, जिससे यह मामला ‘आरक्षण घोटाला’ बन गया है।

अपनी छह साल पुरानी मांग को लेकर सैकड़ों प्रभावित अभ्यर्थी हाल ही में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कार्यालय/आवास के बाहर एकत्र हुए और जोरदार नारेबाजी की। उन्होंने बैनर लेकर अपनी आवाज उठाने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस द्वारा उन्हें रोकने और हटाने की कोशिश के चलते हल्की धक्का-मुक्की और तनाव भी देखने को मिला। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

आरक्षण नियमों के अनुसार परिणाम की पुनः गणना कर नई मेरिट सूची जारी की जाए। भर्ती पैनल की गहन समीक्षा की जाए। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की त्वरित सुनवाई हो और याची लाभ (Petitioner Benefit) दिया जाए।

यह मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय रहा है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा जैसे प्रमुख विपक्षी दलों ने अभ्यर्थियों की मांग का समर्थन किया है। न्यायिक रूप से, हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2024 में कुछ चयन सूचियों को रद्द करते हुए नई सूची बनाने का आदेश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पढ़ाई बाधित न हो, इस आधार पर हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया ही अच्छी शिक्षा की नींव है और इस विवाद का समाधान जल्द निकलना आवश्यक है।

सरकार और कोर्ट पर सभी की निगाहें टिकी हैं कि इस जटिल और छह साल पुराने विवाद का समाधान कब निकलेगा और योग्य अभ्यर्थियों को जल्द से जल्द न्याय मिल पाएगा।

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