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बांग्लादेश चुनाव: क्या तारिक रहमान बनेंगे किंग? भारत के लिए क्यों निर्णायक है यह वोटिंग?

बांग्लादेश चुनाव

पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए आम चुनाव ने न सिर्फ वहां की सत्ता का भविष्य तय किया है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो रहा है। लाखों मतदाताओं ने सड़कों पर उतरकर अपने भविष्य का फैसला किया, लेकिन यह सिर्फ सरकार बदलने का चुनाव नहीं है। राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और प्रमुख दलों के बहिष्कार के कारण यह चुनाव इसलिए अहम है क्योंकि देश की राजनीति एक बड़े शून्य में सिमट गई है, जिसका नेतृत्व विवादित छवि वाले नेता तारिक रहमान कर रहे हैं। डर, उम्मीद और अनिश्चितता के बीच, दुनिया देख रही है कि बांग्लादेश अब किस रास्ते पर जाएगा।

यह चुनाव कई मायनों में असामान्य रहा। राजनीतिक उथल-पुथल के बाद हुए इस मतदान से पहले, देश की राजनीति में दशकों तक हावी रही दो ‘बेगमों’ (शेख हसीना और खालिदा जिया) के वर्चस्व का दौर समाप्त होता दिखा। 2024 के विवादित चुनावों और उसके बाद के विरोध प्रदर्शनों ने सत्ता व्यवस्था को हिला दिया था। अब सबसे बड़ी पार्टी अवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने (या बहिष्कार) के कारण एक बड़ा राजनीतिक शून्य बन गया है।

तारिक रहमान की वापसी और बीएनपी की दावेदारी

इस राजनीतिक खालीपन को भरने के लिए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्रमुख तारिक रहमान सबसे बड़े दावेदार के रूप में सामने आए हैं। खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान पर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोप रहे हैं। वह लगभग 17 साल तक लंदन में रहे, जहां से उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया। दिसंबर 2025 में उनकी अचानक वापसी ने बीएनपी को एक नई ऊर्जा दी है। इस बार का चुनावी मुकाबला बीएनपी और उसके सहयोगी दलों, तथा दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी और नेशनल चार्टर पार्टी (NCP) के गठबंधन के बीच है। जमात अपनी कट्टरपंथी विचारधारा के लिए जानी जाती है, जबकि बीएनपी खुद को लोकतंत्र बहाल करने वाली शक्ति के रूप में पेश कर रही है।

अल्पसंख्यकों का डर और भारत की सुरक्षा

बांग्लादेश की 17 करोड़ 50 लाख की आबादी में से लगभग 12 करोड़ मतदाता इस प्रक्रिया में शामिल हुए, लेकिन सबसे संवेदनशील मुद्दा अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा का है। पिछले कुछ महीनों में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या बढ़ी है। अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान ही अल्पसंख्यकों पर 2900 से अधिक हमले दर्ज किए गए, जिसमें 9 फरवरी को 62 वर्षीय चावल कारोबारी सुसेन चंद्र सरकार की हत्या भी शामिल है। जनता नई सरकार से सबसे पहले सुरक्षा और स्थिरता की गारंटी चाहती है।

बांग्लादेश का चुनाव भारत के लिए सीधा सुरक्षा और व्यापारिक महत्व रखता है। बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक जीवन रेखा है। अगर ढाका में ऐसी सरकार बनती है जो भारत से दूरी बनाकर चीन या पाकिस्तान के करीब जाती है, तो भारत की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। चीन पहले ही बांग्लादेश के बंदरगाहों और ऊर्जा परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश कर चुका है। धार्मिक कट्टरपंथ का बढ़ता प्रभाव और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का बदलना पूरे साउथ एशिया की स्थिरता पर असर डालेगा।

यह चुनाव सिर्फ 151 सीटें जीतकर सरकार बनाने का मसला नहीं है; यह बांग्लादेश में लोकतंत्र और भरोसे को बहाल करने का सवाल है। नतीजें तय करेंगे कि क्या देश राजनीतिक अनिश्चितता से बाहर निकलकर स्थिरता की राह पर चलेगा, या फिर एक नए संघर्ष में उलझेगा। दुनिया की नजरें परिणाम पर टिकी हैं, क्योंकि यह चुनाव पूरे दक्षिण एशिया के भविष्य को परिभाषित करेगा।

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