पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अयोध्या विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की थी, लेकिन कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और यह पहल अधूरी रह गई।
भारत की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने सत्ता से अधिक अपने राजनीतिक साहस और स्पष्टवादिता के लिए पहचान बनाई, उनका राजनीतिक सफर कई ऐसे घटनाक्रमों से जुड़ा रहा, जिनकी चर्चा आज भी होती है, मौजूदा समय में राम मंदिर में चढ़ावे की कथित हेराफेरी और क्षेत्रीय दलों में टूट की चर्चाओं के बीच चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन फिर सुर्खियों में है।
17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे चंद्रशेखर भारत के ऐसे नेताओं में रहे, जिन्होंने लंबे समय तक किसी बड़े सरकारी पद पर रहे बिना सीधे देश के प्रधानमंत्री का पद संभाला, उनका कार्यकाल भले ही केवल 223 दिनों का रहा, लेकिन इस दौरान उन्होंने कई अहम राजनीतिक पहल कीं।
चंद्रशेखर 1965 में कांग्रेस में शामिल हुए थे, वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी के अनुसार, कांग्रेस में शामिल होने के दौरान उनकी मुलाकात तत्कालीन केंद्रीय मंत्री इंदिरा गांधी से हुई, बातचीत के दौरान चंद्रशेखर ने कहा था कि उनका उद्देश्य कांग्रेस को समाजवादी दिशा देना है, जब इंदिरा गांधी ने पूछा कि यदि वे इसमें सफल नहीं हुए तो क्या करेंगे, तब उन्होंने जवाब दिया कि वे कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश करेंगे, क्योंकि उनके अनुसार कांग्रेस एक ऐसा बरगद का पेड़ बन चुकी थी जिसके नीचे कोई नया राजनीतिक विचार विकसित नहीं हो सकता।
बाद में 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी ने अलग गुट बनाकर नई कांग्रेस बनाई, तब चंद्रशेखर ने उनका साथ दिया, इसी दौर में उन्हें कांग्रेस के भीतर ‘यंग तुर्क’ नेताओं में गिना जाने लगा, साल 1990 में राजनीतिक परिस्थितियों के बीच चंद्रशेखर ने जनता दल से अलग होकर अपने समर्थक सांसदों के साथ नई राजनीतिक राह चुनी और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से प्रधानमंत्री बने, हालांकि कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिर गई।
चंद्रशेखर के कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में अयोध्या विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रयास भी शामिल था, वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के अनुसार, प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी दोनों से संवाद शुरू कराया था ताकि आपसी सहमति के आधार पर समाधान निकाला जा सके।
नीरजा चौधरी ने अपनी पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि उस समय कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यदि चंद्रशेखर इस विवाद का समाधान निकालने में सफल हो जाते, तो इससे उनकी राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत हो सकती थी, हालांकि यह एक राजनीतिक आकलन है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
चंद्रशेखर ने बाद में यह भी कहा था कि यदि वे 6 दिसंबर 1992 को प्रधानमंत्री होते, तो बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी घटना नहीं होने देते, उनके साथ काम कर चुके कुछ पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों का भी मानना था कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटते।
आज जब देश में राम मंदिर से जुड़े मुद्दों और विभिन्न राजनीतिक दलों में टूट-फूट पर चर्चा हो रही है, तब चंद्रशेखर के राजनीतिक फैसलों और उनकी कार्यशैली को एक बार फिर याद किया जा रहा है। भारतीय राजनीति में उनका योगदान इस बात के लिए भी उल्लेखनीय माना जाता है कि उन्होंने संवाद, वैचारिक स्पष्टता और राजनीतिक साहस को हमेशा प्राथमिकता दी, भले ही उनका प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल बहुत छोटा रहा हो।


