विश्व विख्यात अघोरपीठ ‘बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड’, रविन्द्रपुरी में हाल ही में अध्यात्म और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। अवसर था दसवें पीठाधीश्वर (ब्रह्मलीन) बाबा राजेश्वर राम (बुढ़ऊ बाबा) जी के ‘महानिर्वाण दिवस’ और वर्तमान (11वें) पीठाधीश्वर अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के ‘अभिषेक दिवस’ का। इस पवित्र दिन को मनाने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पीठ पर पहुंचे, जिससे पूरा परिसर ‘हर हर महादेव’ के उदघोष से गूंज उठा।
साधू-संतों और श्रद्धालुओं के लिए 10 फरवरी का दिन विशेष मायने रखता है। यही कारण था कि 9 फरवरी की सुबह से ही अघोरपीठ में भक्तों का आगमन शुरू हो गया था। 10 फरवरी को दैनिक साफ़-सफ़ाई, आरती-पूजन के बाद, दुनिया भर में अघोर परंपरा के मुखिया और वर्तमान (11वें) पीठाधीश्वर, अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी की एक झलक पाने का इंतजार शुरू हुआ। जैसे ही सुबह करीब साढ़े दस बजे अघोराचार्य अपने कक्ष से बाहर निकले, भक्तों ने गगनभेदी ‘हर हर महादेव’ का जयघोष किया, जिससे पूरा अघोरपीठ परिसर गूंज उठा। हालांकि भीड़ बहुत अधिक थी, लेकिन श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और अनुशासन का परिचय देते हुए कतारबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार किया।
अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी ने सबसे पहले अपने दादा गुरु, बाबा राजेश्वर राम (बुढ़ऊ बाबा) जी, की समाधि का आरती पूजन कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद, उन्होंने परिसर में मौजूद अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी और अघोरेश्वर महाप्रभु बाबा अवधूत भगवान राम जी की मूर्ति व समाधि पर भी श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। इसके पश्चात, अघोराचार्य जैसे ही अपने विश्वविख्यात ‘औघड़-तख़्त’ पर आसीन हुए, पूरा परिसर एक बार फिर ‘हर हर महादेव’ के जयकारे से गूंज उठा। एक-एक कर सभी श्रद्धालु और साधुजनों ने अपने आराध्य का दर्शन किया और प्रसाद ग्रहण किया। दर्शन-पूजन एवं प्रसाद ग्रहण का यह सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। साथ ही, विख्यात सामाजिक संस्था ‘अघोराचार्य बाबा कीनाराम शोध एवं सेवा संस्थान’ दिवस भी मनाया गया।
इस दौरान भक्तों की भारी भीड़ की आशंका को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने भी यातायात और सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए थे, जो सफल रहे। अघोरपीठ परिसर के बाहर मेले जैसा दृश्य था, जहाँ दर्शन-पूजन के बाद बड़ी संख्या में लोग खरीदारी करते भी दिखे।
यह वार्षिक आयोजन अघोर परंपरा के प्रति भक्तों की अटूट आस्था और समर्पण को दर्शाता है, जहाँ अनुशासित भीड़ ने शांतिपूर्ण तरीके से अपने आराध्य के दर्शन किए।









