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अजित पवार जिंदा होते तो महाराष्ट्र की राजनीति में आ जाता सबसे बड़ा भूचाल? NCP के विलय की थी पूरी तैयारी

अजित पवार जिंदा होते तो महाराष्ट्र की राजनीति में आ जाता सबसे बड़ा भूचाल

महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक ऐसे रहस्य पर चर्चा हो रही है, जिसने इतिहास बदल कर रख दिया। दिवंगत डिप्टी सीएम अजित पवार के निधन के बाद यह बड़ा खुलासा हुआ है कि अगर वह जिंदा होते, तो शायद महाराष्ट्र की सियासत में सबसे बड़ा सुलह अध्याय लिखा जा चुका होता। एक विमान हादसे ने न सिर्फ एक प्रमुख नेता को छीना, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों के बहुप्रतीक्षित विलय को भी हमेशा के लिए रोक दिया।

महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में यह खबर तेजी से फैल रही है कि अजित पवार की असामयिक मृत्यु से कुछ ही दिन पहले, उन्होंने अपने चाचा और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के साथ एक लंबी और निर्णायक बातचीत की थी। सूत्रों के अनुसार, इस बातचीत में दोनों नेताओं ने पार्टी के टूटे हुए गुटों को फिर से एक साथ लाने पर सहमति जताई थी। यह एक ऐसा बड़ा राजनीतिक पुनर्मिलन था, जिसे दोनों नेताओं ने महाराष्ट्र के हित में सबसे आवश्यक कदम माना था।

अजित पवार के करीबी सहयोगी किरण गुजर ने भी इस दावे की पुष्टि की है। उनके अनुसार, बारामती विमान हादसे से लगभग 5 दिन पहले चाचा-भतीजे के बीच इस विषय पर गंभीर और सकारात्मक चर्चा हुई थी। विलय की पूरी रणनीति तैयार कर ली गई थी और यह तय हो चुका था कि जिला परिषद चुनाव संपन्न होने के तुरंत बाद, 8 फरवरी को एनसीपी के विलय का औपचारिक ऐलान किया जाएगा।

लेकिन यह ऐतिहासिक घोषणा होने से पहले ही नियति ने हस्तक्षेप कर दिया। 28 जनवरी की सुबह, मुंबई से बारामती जा रहा विमान लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, कम विजिबिलिटी के कारण पहली लैंडिंग कोशिश असफल रही, जिसके बाद दूसरी कोशिश के दौरान विमान नियंत्रण खो बैठा और क्रैश के बाद उसमें आग लग गई। इस भीषण हादसे में अजित पवार समेत उनके पर्सनल गार्ड, फ्लाइट क्रू और पायलट सहित कुल 5 लोगों की मौत हो गई। एक पल में, महाराष्ट्र की राजनीति का संभावित भविष्य वहीं थम गया।

आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अजित पवार अब नहीं रहे, बल्कि यह है कि महाराष्ट्र किस बड़े राजनीतिक बदलाव से वंचित रह गया। जिस एकता की तैयारी पूरी हो चुकी थी और जिस फैसले से राजनीति की दिशा बदल सकती थी, वह सब एक हादसे के साथ इतिहास में अधूरा रह गया। महाराष्ट्र ने सिर्फ एक नेता ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संभावना को भी खो दिया है।

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