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गोलक विवाद: CM भगवंत मान नंगे पांव अकाल तख्त के सामने हुए पेश, जानें क्यों नहीं मिली ‘सेवा’

अकाल तख्त में पेश होने वाले चौथे CM बने मान

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान हाल ही में सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था, श्री अकाल तख्त साहिब के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। यह पेशी उनके द्वारा दिए गए ‘गुरु की गोलक’ और ‘दसवंध’ (धार्मिक दान) को लेकर दिए गए बयानों के संबंध में थी, जिन्हें सिख मर्यादा के विरुद्ध माना गया था। CM भगवंत मान अमृतसर पहुंचकर नंगे पांव स्वर्ण मंदिर गए, मत्था टेका और फिर जत्थेदार को स्पष्टीकरण देने के लिए अकाल तख्त सचिवालय पहुंचे।

यह पूरा मामला मुख्यमंत्री मान द्वारा सार्वजनिक रूप से गुरुद्वारों की गोलक और दसवंध के प्रबंधन पर सवाल उठाने से जुड़ा है। इन टिप्पणियों के बाद, अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने इसे सिख मर्यादा का उल्लंघन और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया। इसी आधार पर, उन्होंने मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से स्पष्टीकरण के लिए तलब किया था।

सीएम भगवंत मान ने पेशी से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह यहां मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य श्रद्धालु के तौर पर आए हैं। आज सुबह अमृतसर पहुंचने पर, CM मान ने पहले स्वर्ण मंदिर में मत्था टेका और उसके बाद सीधे अकाल तख्त सचिवालय पहुंचे। जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने बताया कि CM मान की पेशी सचिवालय के बंद कमरे में हुई, क्योंकि सिख परंपरा के अनुसार, जो व्यक्ति अमृतधारी (पूर्ण सिख) नहीं होते, उनकी पेशी अकाल तख्त की फसील पर नहीं की जाती। सूत्रों के अनुसार, CM मान ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि गुरुद्वारों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना था।

यह ध्यान देने योग्य है कि भगवंत मान अकाल तख्त के समक्ष पेश होने वाले पंजाब के चौथे मुख्यमंत्री बन गए हैं। इससे पहले, अविभाजित पंजाब के मुख्यमंत्री भीम सेन सच्चर (1955), प्रकाश सिंह बादल (1979) और सुरजीत सिंह बरनाला (1988) को भी अकाल तख्त ने तलब किया था, जिन्हें धार्मिक सजा या ‘सेवा’ दी गई थी। हालांकि, जत्थेदार ने स्पष्ट कर दिया है कि CM मान को कोई धार्मिक दंड (सेवा या तनखैया) नहीं दिया जाएगा, क्योंकि वह पूर्ण सिख नहीं माने जाते। यह पेशी केवल स्पष्टीकरण तक सीमित थी।

मुख्यमंत्री मान का यह कदम दिखाता है कि राजनीति में सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के लिए भी धार्मिक आस्थाओं का सम्मान सर्वोपरि होता है, और आस्था से जुड़े संवेदनशील मामलों में तुरंत नतमस्तक होकर जवाब देना आवश्यक होता है।

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