गाजा संकट पर यूएई का बदला रुख, नेतन्याहू से मुलाकात कर अरब जगत को चौंकाया

Israel-Arab Conflict : गाज़ा पट्टी में जारी हिंसा और बढ़ती नागरिक मौतों के बीच, संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब अधिकांश अरब देशों ने इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ विरोध दर्ज कराया, उस वक़्त संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने चुपचाप एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना।

यूएई न सिर्फ महासभा में नेतन्याहू के संबोधन के दौरान मौजूद रहा, बल्कि बाद में उनके साथ एक विशेष मुलाकात भी की। इस कदम ने जहाँ अन्य अरब प्रतिनिधियों के बहिष्कार को कमज़ोर किया, वहीं क्षेत्रीय राजनीति में एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है।

नहीं किया नेतन्याहू के भाषण का बहिष्कार

जहाँ जॉर्डन, कतर और अल्जीरिया जैसे देशों के प्रतिनिधि नेतन्याहू के भाषण के दौरान सभा छोड़कर चले गए, वहीं यूएई के अधिकारी पूरे समय मौजूद रहे। इसके बाद अबू धाबी में नेतन्याहू से एक बंद कमरे में बैठक हुई, जहाँ गाज़ा संघर्ष को समाप्त करने और मानवीय हालात पर चर्चा की गई।

यूएई के विदेश मंत्रालय ने इस बातचीत को “संकट में समाधान खोजने की एक गंभीर कोशिश” बताया। बयान में कहा गया कि बातचीत में युद्धविराम की आवश्यकता, आम नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव को कम करने पर जोर दिया गया।

यूएई का यह व्यवहार उन परंपरागत रुखों से बिल्कुल अलग है जो वह पहले अपनाता आया है। एक समय में खुद को अरब एकता का समर्थक कहने वाला देश अब व्यावहारिक कूटनीति और रणनीतिक संतुलन की ओर बढ़ता दिख रहा है।

अब्राहम समझौते का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रवैया अब्राहम समझौते के बाद यूएई की बदलती विदेश नीति को दर्शाता है, जहाँ इज़रायल से बातचीत और संबंधों को प्राथमिकता दी जा रही है। हालाँकि, इस कदम से यूएई को अरब जगत के कई देशों से आलोचना का सामना भी करना पड़ रहा है, जो मानते हैं कि गाज़ा में हो रहे हालात के मद्देनज़र इज़रायल के साथ किसी भी तरह की निकटता ठीक नहीं है।

फिर भी, अबू धाबी का मानना है कि ऐसे संवेदनशील समय में वार्ता और संपर्क बनाए रखना ही स्थायी समाधान की ओर पहला कदम हो सकता है। यूएई अधिकारियों का कहना है कि बहिष्कार की नीति से ज़्यादा कारगर है कि सभी पक्षों के साथ बातचीत जारी रखी जाए।

गाज़ा में जारी युद्ध और मानवीय संकट के बीच यूएई की यह पहल यह दर्शाती है कि वह खुद को क्षेत्र में एक ऐसा पक्षकार बनाना चाहता है जो टकराव से नहीं बल्कि संवाद से समाधान की ओर बढ़े। उसकी यह रणनीति यही संकेत देती है कि मौजूदा तनाव के समय में सभी पक्षों से संवाद बनाए रखना ज़्यादा असरदार हो सकता है बजाय विरोध या बहिष्कार के।

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