हाल ही में चीनी कस्टम्स द्वारा जारी किए गए आंकड़े भारत और चीन के बीच व्यापार के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंचने की पुष्टि करते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा विशाल व्यापार घाटा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। वित्तीय वर्ष 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 155 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। सवाल यह है कि यह वृद्धि भारतीय बाजार के लिए खुशखबरी है या खतरे की घंटी?
नए आंकड़ों के अनुसार, भारत-चीन का द्विपक्षीय व्यापार अब तक के सबसे ऊंचे स्तर $155.62 अरब तक पहुंच गया है। हालांकि यह आंकड़ा दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक संबंधों को दर्शाता है, लेकिन चिंता का विषय व्यापार घाटा है। यह घाटा लगभग $116.12 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो लगातार दूसरे वर्ष $100 अरब डॉलर से ऊपर रहा है।
जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच भारत ने चीन को $19.75 अरब का सामान निर्यात किया, जिसमें लगभग 9.7% की वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन इसके विपरीत, चीन से भारत का आयात $135.87 अरब तक पहुंच गया। यह दर्शाता है कि भारत अपने निर्यात की तुलना में लगभग सात गुना ज्यादा सामान चीन से खरीद रहा है। इस असंतुलन का मुख्य कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और तकनीकी घटकों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर भारत की बढ़ती निर्भरता है।
जब कोई देश निर्यात की तुलना में अत्यधिक आयात करता है, तो उसके गंभीर आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। इस बड़े घाटे से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है, स्थानीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने में मुश्किल होती है, और लंबे समय में देश में नौकरियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञों की राय है कि यदि यह पैटर्न जारी रहता है, तो यह देश की आर्थिक मजबूती को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए भारत को तुरंत नीतिगत बदलाव पर काम करना होगा। इसके तहत, घरेलू विनिर्माण (डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग) को बढ़ावा देना, चीन पर निर्भरता कम करना और वैश्विक बाजारों में भारत की निर्यात पहुंच को मजबूत करना आवश्यक है।
भले ही भारत और चीन के बीच व्यापार फल-फूल रहा है, लेकिन इस विशाल व्यापार घाटे को नियंत्रित करना भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता और मजबूती के लिए सबसे बड़ी और अहम चुनौती बन चुका है।









