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भारत-अमेरिका ट्रेड वॉर में दालों की एंट्री: टैरिफ ने व्हाइट हाउस तक क्यों पहुंचाया किसानों का दबाव?

भारत–अमेरिका Trade War में दालों की एंट्री

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर गहराता दिख रहा है। लेकिन इस बार यह मामला केवल टैरिफ (Tariffs) तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे अमेरिकी किसानों के खेतों और भारतीय उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंच गया है। हाल ही में अमेरिका द्वारा कुछ भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाने के जवाब में, भारत ने चुपचाप लेकिन प्रभावी तरीके से अमेरिकी दालों और फलियों पर आयात शुल्क (Import Duty) बढ़ा दिया है, जिसने अब अमेरिकी राजनीति में हलचल मचा दी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में भारत से आयात होने वाले कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद, भारत ने भी जवाबी कदम उठाया है। भारत सरकार ने अमेरिका से आने वाली दालों (Pulses) और फलियों पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया। भारत ने इस कदम को सार्वजनिक रूप से प्रचारित नहीं किया, ताकि यह विवाद खुलकर ‘ट्रेड वॉर’ की शक्ल न ले, लेकिन इसका असर नॉर्थ डकोटा और मोंटाना जैसे राज्यों की कृषि अर्थव्यवस्था पर गहराई से पड़ा है।

भारत के इस कदम को अमेरिकी किसानों के लिए आर्थिक रूप से हानिकारक बताते हुए, अमेरिका के दो प्रभावशाली सीनेटरों, केविन क्रैमर और स्टीव डेन्स, ने राष्ट्रपति ट्रंप को एक कड़ा पत्र लिखा है। उन्होंने मांग की है कि टैरिफ के कारण हुए नुकसान को कम किया जाए और इस मुद्दे को प्राथमिकता दी जाए। सीनेटरों की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

भारत के साथ होने वाली व्यापार वार्ता में दालों को प्राथमिकता से शामिल किया जाए।

अमेरिकी दालों पर लगाए गए 30 प्रतिशत टैरिफ को कम कराने के लिए तत्काल कोशिश की जाए।

भारतीय बाजार को अमेरिकी किसानों के लिए दोबारा खोला जाए।

भारत के लिए दालें सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का विषय हैं। भारत सरकार ने यह आयात शुल्क इसलिए बढ़ाया ताकि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिले और भारतीय किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके। अगर बिना शुल्क के सस्ती आयातित दालें बाजार में आतीं, तो मसूर, चना, और मटर जैसी फसलों पर निर्भर भारतीय किसानों को भारी नुकसान होता। इसी नीति के तहत, सरकार का संदेश साफ है—पहले किसान, बाद में ट्रेड डील। यह विवाद अब दालों को दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण मोलभाव का हथियार (Bargaining Tool) बना चुका है।

यह पूरा घटनाक्रम दालों को अमेरिका की घरेलू राजनीति का मुद्दा बना चुका है। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका भारत जैसे बड़े रणनीतिक साझेदार को पूरी तरह नाराज़ नहीं करना चाहता, लेकिन किसानों की नाराज़गी ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक जोखिम है। ऐसे में संभव है कि किसी बड़े व्यापार पैकेज के तहत दालों पर सीमित राहत या कोई बीच का रास्ता निकाला जाए।

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