इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति चरम पर है। सत्ता पक्ष और विपक्ष में लगातार आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है। आने वाले साल 2027 के चुनाव को नजर में रखते हुए हर पार्टी अपनी तैयारी में लगी हुई है। इस बीच अखिलेश यादव का एक विवादित बयान सामने आया है जिसमे वो RLD प्रमुख को तंज करते हुए दिखाई दे रहे है।
अभी कुछ दिनों पहले अखिलेश यादव ने RLD प्रमुख पर निशाना साधते हुए कहा था- ‘हमने लोगों को चवन्नी से रुपया बनाया और वो लोग हमें ही छोड़कर चले गए।’
जयंत चौधरी का पलटवार
जिस पर जयंत चौधरी ने पलटवार करते हुए X पर लिखा- “सियासत की लड़ाई में कुछ सस्ते शब्द बोलने ही थे तो मेरा नाम लेकर बोल देते, कोई बात नहीं थी। जाट समाज को टारगेट करना और ABCD हमने सिखाई है? ऐसे अहंकार मैं देख चुका हूँ करीब से और मैं ऐसा मानता हूँ, ऐसा आचरण बस पतन लाता है।”
इससे पहले भी जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव पर प्रतिक्रिया देते हुए अपनी बात कहने की सलाह दी थी. उन्होंने कहा कि वो अपनी बात कहें तो अच्छा है. उनके साथ खड़े होने वाले सहयोगी, जिन्होंने आजतक उनका सहयोग हो उनको वो इस तरह की बयानबाजी करके सोचने पर मजबूर कर रहे हैं. बाकी ये लोकतंत्र हैं यहां जनता सबको बनाती और बिगाड़ती है.
मायावती ने भी किया अखिलेश यादव पर हमला
BSP प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश यादव पर जमकर हमला बोला। उन्होंने RLD और उसके नेता को लेकर दिए गए अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान को आपत्तिजनक बताते हुए सपा नेतृत्व से माफी मांगने की मांग की।
मायावती ने कहा कि यह टिप्पणी केवल एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जाट समाज और चौधरी चरण सिंह के परिवार की भावनाएं भी आहत हुई हैं।
2019 के गठबंधन पर भी उठाए सवाल
मायावती ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए सपा-बसपा गठबंधन का भी हवाला दिया। उनका कहना है कि चुनाव के बाद यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका और इसके पीछे सपा का कथित अहंकारी और स्वार्थपूर्ण रवैया जिम्मेदार था। उन्होंने कहा कि गठबंधन की राजनीति में भरोसा और सम्मान जरूरी होता है, लेकिन सपा के साथ उनके अनुभव इसके बिल्कुल विपरीत रहे हैं।
PDA की राजनीति पर अखिलेश को घेरा
मायावती ने अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा अपने राजनीतिक फायदे के अनुसार PDA में शामिल ‘P’ की व्याख्या बदलती रही है। बसपा प्रमुख ने सपा की पिछली सरकारों पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और सवर्ण समाज के हितों की अनदेखी करने का आरोप भी लगाया। कानून-व्यवस्था के मुद्दे को लेकर भी उन्होंने सपा सरकारों के कार्यकाल पर निशाना साधा।
अब आगे क्या?
आने वाले साल 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है, जिसको लेकर हर पार्टी की तैयारी जोरों पर है। इस समय पर अखिलेश यादव का ये बयान क्या सही था? सत्ता और राजनीति क्या इतनी जरूरी हो गई है कि लोग अपनी भाषा की मर्यादा ही भूल जाएं? अब देखना यह होगा कि ये बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या सियासी हलचल लेकर आता है।