सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं को जीवंत बनाए रखने की दिशा में वाराणसी में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान का पुनरुद्धार किया गया है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के प्रयासों से, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित सदियों पुरानी परंपरा को एक बार फिर शुरू किया गया है, जिसके तहत त्रिवेणी संगम के पवित्र जल से बाबा विश्वनाथ का विधिवत अभिषेक किया गया। यह आयोजन आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत प्रतीक बन गया है।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) विश्व भूषण मिश्रा के संयोजन में यह विशेष धार्मिक प्रक्रिया संपन्न कराई गई। इस अनुष्ठान में पौराणिक तीर्थ त्रिवेणी संगम के पावन जल को एकत्रित कर श्री काशी विश्वनाथ महादेव के अभिषेक के लिए उपयोग किया गया।
धार्मिक प्रक्रिया के तहत, बाबा विश्वनाथ धाम से विशेष रूप से सज्जित वाहन के माध्यम से संगम का निर्मल जल पवित्र जल-घड़ों में भरकर रुद्रावतार महाबली हनुमान मंदिर (बड़े हनुमान मंदिर) भेजा गया। वहां, मंदिर के पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजा-अर्चना की गई।
बड़े हनुमान मंदिर के वरिष्ठ पुजारी महंत पुनीत पुरी महाराज और पुजारी सूरज पांडे ने भोग-प्रसाद अर्पित कर परंपरानुसार यह पावन जल श्री काशी विश्वनाथ महादेव को समर्पित किए जाने की प्रक्रिया पूर्ण की। इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान के दौरान नायब तहसीलदार एवं मजिस्ट्रेट मिनी एल. शेखर, मेला प्राधिकरण के मेला प्रबंधक ऋषि राज मिश्रा, सहित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के कई पदाधिकारी एवं प्रबंधन से जुड़े अधिकारी उपस्थित रहे। सभी ने इस परंपरा के निर्वहन को सनातन संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक सार्थक पहल बताया।
यह उल्लेखनीय है कि यह धार्मिक परंपरा मूल रूप से आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के विभिन्न पवित्र तीर्थों के माध्यम से सनातन परंपरा को एक सूत्र में बांधना था। न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्रा के प्रयासों से इस परंपरा को सांस्कृतिक नवाचार और समन्वय के साथ पुनः जीवंत किया जा रहा है। न्यास की ओर से श्री बड़े हनुमान मंदिर और श्री कुंभेश्वर महादेव को भोग-प्रसाद एवं उपहार प्रेषित किए जाने की परंपरा भी निभाई जाएगी, जिससे आपसी धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध और अधिक सुदृढ़ होंगे।
काशी विश्वनाथ न्यास का यह प्रयास धार्मिक समन्वय और प्राचीन भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है, जिससे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और मजबूत हुई है।









