महाराष्ट्र की राजनीति में ‘हरा’ बनाम ‘भगवा’ पर घमासान: AIMIM के बयान से क्यों मचा सियासी तूफान?

महाराष्ट्र की राजनीति में 'हरा' बनाम 'भगवा' पर घमासान
महाराष्ट्र की राजनीति में 'हरा' बनाम 'भगवा' पर घमासान

महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ‘रंगों की जंग’ में बदलती नजर आ रही है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेताओं द्वारा दिए गए ‘महाराष्ट्र को हरा करेंगे’ वाले बयान ने राज्य में बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। महायुति (बीजेपी और शिवसेना शिंदे गुट) के नेताओं ने इस बयान को इतिहास, आस्था और अस्मिता पर हमला बताते हुए तीखा पलटवार किया है। आइए जानते हैं कि यह विवाद क्यों गरमाया है और इसके पीछे की राजनीतिक रणनीति क्या है।

इस पूरे मामले की शुरुआत AIMIM नेता इम्तियाज जलील के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने नव निर्वाचित पार्षद सहर शेख के ‘मुंब्रा को हरा कर देंगे’ वाले कथन का समर्थन करते हुए कहा कि ‘सिर्फ मुंब्रा नहीं, हम पूरा महाराष्ट्र हरा करेंगे।’ AIMIM का दावा है कि यह बयान महाराष्ट्र में पार्टी के राजनीतिक विस्तार और चुनावी ताकत को दर्शाने के लिए दिया गया है। पार्टी विशेष रूप से मुंब्रा, औरंगाबाद और नांदेड़ जैसे शहरी मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी नेताओं का तीखा पलटवार

AIMIM नेताओं के इस बयान के तुरंत बाद, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मोर्चा संभाल लिया और सियासी हमला तेज कर दिया। बीजेपी नेता शायना एनसी ने पलटवार करते हुए कहा कि AIMIM सिर्फ इस्लामीकरण की राजनीति करती है। उन्होंने कड़े शब्दों में याद दिलाया कि औरंगजेब, अकबर या बाबर जैसा कोई भी शासक इस देश को हरा नहीं कर पाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि है, जहां हिंदवी स्वराज की स्थापना हुई थी। वहीं, मुंबई बीजेपी अध्यक्ष अमित साटम ने और भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि AIMIM नेता 100 बार जन्म लेने के बाद भी भगवा को छू नहीं पाएंगे। मंत्री नितेश राणे ने तो AIMIM नेताओं को सीधे पाकिस्तान जाने की सलाह तक दे डाली। बीजेपी नेता कृष्णा हेगड़े ने इन बयानों को देश को धर्म के आधार पर बांटने वाला बताते हुए कानून से कार्रवाई की मांग की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रंग, धर्म और पहचान की राजनीति अक्सर चुनाव से पहले भावनाएं भड़काने का एक हथियार बन जाती है। हालांकि, हाल के चुनावों में यह देखने को मिला है कि महाराष्ट्र की जनता नारों से ज्यादा काम और परफॉर्मेंस के आधार पर फैसला करती है, बावजूद इसके यह बयानबाजी राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती है।

चाहे वह हरा रंग हो या भगवा, महाराष्ट्र की असली पहचान उसके संविधान, संस्कृति और विकास से जुड़ी है। रंगों की इस राजनीति में सवाल सिर्फ सत्ता हासिल करने का नहीं, बल्कि समाज की एकता बनाए रखने का है। अब देखना यह होगा कि यह बयानबाजी महाराष्ट्र की सियासत में और क्या नया मोड़ लाएगी।

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