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मिडिल ईस्ट जंग की तपिश: अमेरिका-ईरान तनाव से भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे हैं 4 बड़े खतरे

मिडिल ईस्ट जंग की तपिश

मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच गहराता तनाव चिंता का विषय बना हुआ है। भू-राजनीति के विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर मिडिल ईस्ट में बारूद फटा, तो उसकी सबसे तेज़ आंच सरहद से हजारों किलोमीटर दूर भारत की अर्थव्यवस्था को झुलसा देगी। पहली नजर में यह सवाल अटपटा लग सकता है कि मिसाइलें अगर ईरान-अमेरिका के बीच चलेंगी, तो भारत क्यों जलेगा? लेकिन यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और कड़वा सच है, जिसका असर सीधे आपकी जेब, आपके घर के बजट और देश की रफ्तार पर पड़ेगा।

दुनिया यह हिसाब लगा रही है कि इस टकराव में जीत किसकी होगी, जबकि हकीकत यह है कि किसी भी पक्ष की जीत हो, हार भारत की तय मानी जा रही है। अगर हालात जंग में बदलते हैं, तो भारत को इन चार गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है:

भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है। युद्ध की आहट के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आग की तरह भड़केंगी। जैसे ही कच्चा तेल महंगा होगा, देश में पेट्रोल-डीजल के दाम बेकाबू हो जाएंगे। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से उसका सीधा असर आपकी थाली तक पहुंचेगा। सब्ज़ी, दाल, दूध, गैस और दवाइयां—हर चीज़ की कीमत बढ़ने लगेगी। देश महंगाई के ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएगा, जहां से निकलना आसान नहीं होगा।

भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट पर बड़ा दांव लगाया है, जो मध्य एशिया तक पहुंच बनाने का अहम रास्ता है। अगर अमेरिका-ईरान युद्ध हुआ और ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगे, तो यह अहम व्यापारिक दरवाज़ा लगभग बंद हो सकता है।

ईरान के पास होरमुज जलडमरूमध्य को बंद करने की ताकत है। यह दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता है, जिससे भारत का बड़ा तेल और गैस गुजरता है। यह रास्ता बंद होने पर भारत में गंभीर ऊर्जा संकट मच जाएगा।

जंग की स्थिति में वाशिंगटन (अमेरिका) भारत पर दबाव डालेगा कि वह ईरान से अपने ऐतिहासिक और व्यापारिक रिश्ते तोड़ दे। भारत हमेशा संतुलित विदेश नीति की बात करता रहा है, लेकिन ऐसी स्थिति में अगर अमेरिका की बात मानी, तो ईरान जैसा पुराना और भरोसेमंद साझेदार दूर हो जाएगा। अगर अमेरिका की बात नहीं मानी, तो निवेश, टेक्नोलॉजी और रक्षा सहयोग पर खतरा मंडराने लगेगा।

पश्चिम एशिया में करीब 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं। ये लोग सालाना अरबों डॉलर भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जंग छिड़ते ही इन लोगों की जान और नौकरियां दोनों खतरे में पड़ जाएंगी। इन्हें सुरक्षित वापस लाना भारत सरकार के लिए अब तक का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन बन सकता है। अगर रेमिटेंस रुकता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर पड़ेगा और रुपया कमजोर होगा।

सीधे शब्दों में कहें तो इस युद्ध का कोई भी नतीजा भारत के लिए फायदे का नहीं है। भारत की असली जीत किसी एक पक्ष की जीत में नहीं, बल्कि इस जंग के टलने में निहित है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में उठने वाली यह आग हमारी अर्थव्यवस्था को झकझोरने की पूरी ताकत रखती है।