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Operation Black Bill Part 2: LNJP में दवा खरीद से जुड़े सवाल, टेंडर से मनी ट्रेल तक जांच की मांग, जाने पूरी रिपोर्ट

Operation Black Bill Part 2 में LNJP अस्पताल की दवा खरीद प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों की पड़ताल। टेंडर, सप्लाई और मनी ट्रेल से जुड़े आरोपों की जांच की मांग की जा रही है।
Operation Black Bill Part 2
Operation Black Bill Part 2: LNJP दवा खरीद पर सवाल

लोक नायक अस्पताल (LNJP) में दवाओं की खरीद को लेकर शिकायत में उठाए गए सवाल अब टेंडर से आगे बढ़कर दवा की कीमत, सप्लाई, लाइसेंस, कंपनियों के कथित नेटवर्क और भुगतान तक पहुंच गए हैं. शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की जांच की मांग की है.

टेंडर की शर्तों पर सवाल

शिकायत के मुताबिक, 2025 के टेंडर में Generic, Branded और DPCO तीनों कैटेगरी की दवाओं के लिए करीब 3.74 करोड़ रुपये के टर्नओवर की शर्त रखी गई थी. तीनों कैटेगरी के लिए अलग-अलग EMD का प्रावधान बताया गया है, जिसकी कुल रकम करीब 75.90 लाख रुपये होने का दावा है.

शिकायतकर्ता का आरोप है कि टेंडर की इन शर्तों से प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती थी. साथ ही, तीनों कैटेगरी का टेंडर एक ही Supplier Firm को मिलने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं.

83.99% डिस्काउंट, फिर भी कीमत पर सवाल

शिकायत में संबंधित Supplier को अलग-अलग कैटेगरी में दिए गए Discount का भी उल्लेख है।

  • Generic – 83.99%
  • DPCO – 60%
  • Branded – 52%

हालांकि, केवल Discount प्रतिशत से दवा सस्ती साबित नहीं होती. वास्तविक स्थिति जानने के लिए MRP, Discount के बाद की Net Purchase Price, Market Price और जहां लागू हो वहां DPCO Ceiling Price का मिलान करना जरूरी है।

Paracetamol IV की कीमत पर बड़ा सवाल

शिकायत में Paracetamol IV 1000 mg/100 ml का उदाहरण दिया गया है. शिकायतकर्ता के मुताबिक, एक Generic विकल्प की कीमत करीब ₹34 प्रति बोतल थी, जबकि अस्पताल को सप्लाई किए गए Product का MRP करीब ₹755 बताया गया है और इसकी Supply करीब ₹300 प्रति बोतल की दर से होने का दावा किया गया है.

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल दो उत्पादों की कीमत की तुलना से खरीद में अनियमितता साबित नहीं होती. दोनों Products के Manufacturer, Specification, Quality और Category का मिलान जांच का अहम हिस्सा होगा.

35% Generic का प्रावधान, सप्लाई 0.5% से कम का दावा

शिकायतकर्ता के Analysis के मुताबिक, Tender में Generic दवाओं की अनुमानित हिस्सेदारी करीब 35% थी. वहीं उपलब्ध Bills के Analysis के आधार पर वास्तविक Generic Supply 0.5% या उससे कम होने का दावा किया गया है.

अगर यह आंकड़ा रिकॉर्ड की जांच में सही पाया जाता है तो बड़ा सवाल उठता है कि Tender में तय Generic हिस्सेदारी और वास्तविक Supply के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों रहा.

दवाओं की Category बदलने का आरोप

शिकायत में कुछ दवाओं को अलग-अलग जगह Generic और Branded Category में दिखाए जाने का आरोप भी लगाया गया है. इसमें B Complex, Multivitamin, Vitamin D3 और Bromhexine जैसी दवाओं का उल्लेख है.

ऐसे में जांच का सवाल है कि दवाओं की Category किस आधार पर तय की गई और Category के आधार पर उनकी खरीद कीमत कैसे निर्धारित हुई.

Supplier के Drug Licence पर भी सवाल

शिकायत में Supplier के Drug Licence को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई है. इसमें Wholesale Licence उपलब्ध होने का दावा किया गया है, जबकि Retail Licence को लेकर सवाल उठाए गए हैं.

इसकी जांच में यह देखना जरूरी होगा कि Tender के समय कौन सा Licence आवश्यक था, Supplier के पास वैध Licence था या नहीं और Supply के दौरान Licence की स्थिति क्या थी.

संबंधित Supplier की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज किए जाने की बात भी सामने आई है.

Supplier से जुड़ी कंपनियों के कथित नेटवर्क का दावा

शिकायत में Supplier से जुड़े लोगों के परिचितों और रिश्तेदारों के नाम पर संचालित कथित Firms और Companies के बीच लेन-देन का भी जिक्र है. लेकिन अगर जांच में Owners, Directors, Partners, Addresses, GST Details, Bank Accounts या Financial Transactions के बीच संबंध सामने आते हैं, तो उनकी पड़ताल जरूरी होगी.

CPA से कथित कनेक्शन

शिकायत में दिल्ली सरकार की Central Procurement Authority (CPA) से जुड़े एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया गया है. शिकायतकर्ता ने दोनों मामलों में कुछ समानताओं की ओर इशारा किया है. इसके लिए संबंधित कंपनियों, Directors, Partners, Addresses और Financial Transactions की जांच जरूरी होगी.

करीब ₹300 करोड़ की दवा सप्लाई

शिकायत में करीब ₹300 करोड़ की दवा सप्लाई का उल्लेख किया गया है. लेकिन कुल Supply Value को सीधे वित्तीय नुकसान नहीं माना जा सकता. कथित नुकसान की वास्तविक गणना के लिए दवाओं की Quantity, Purchase Price, Market Price, MRP, Discount और लागू होने पर DPCO Ceiling Price का मिलान करना होगा.

पैसा आखिर गया कहां?

मामले का सबसे अहम हिस्सा Money Trail है. जांच में यह पता लगाना होगा कि अस्पताल ने किस Supplier को कितना भुगतान किया और उसके बाद यह रकम किन खातों में गई.

इसके लिए Sales Invoice, GST Records, Stock Records और Bank Transactions का मिलान किया जाना जरूरी होगा. अगर अलग-अलग कंपनियों के बीच पैसों का लेन-देन हुआ है, तो यह भी देखना होगा कि उसके पीछे वास्तविक कारोबारी लेन-देन था या नहीं.

Supplier का पक्ष

इस मामले में भारत अपडेट के तरफ से Supplier से बातचीत करने का प्रयास किया गया.  जिसके बाद फर्म के मालिक ने सभी आरोपों को खारिज किया .दवाओं की कीमत और खरीद से जुड़े सवालों को उन्होंने जांच का विषय बताया और जांच के बाद जवाब देने की बात कही.

जांच में तय होगी जिम्मेदारी

इस मामले में यह देखना होगा कि टेंडर की शर्तें किसने तय कीं, Supplier की Eligibility किसने Verify की, दवाओं की Category और Rate किस आधार पर तय हुए, Supply किसने स्वीकार की, Bills किसने पास किए और Payment किसने Authorize किया.

शिकायत में अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है। लेकिन फिलहाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा.  इसकी पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही हो सकती है.

अब सबसे बड़े सवाल

LNJP की दवा खरीद से जुड़े इस मामले में जांच के सामने कई अहम सवाल हैं—

  • क्या टेंडर की शर्तों ने प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया?
  • क्या तीनों कैटेगरी का टेंडर एक ही Supplier को मिला?
  • दवाओं की Category किस आधार पर तय हुई?
  • क्या MRP और वास्तविक Purchase Price में असामान्य अंतर था?
  • 35% Generic प्रावधान के मुकाबले Supply 0.5% से कम क्यों बताई गई?
  • Supplier के पास आवश्यक और वैध Drug Licence था या नहीं?
  • क्या संबंधित कंपनियों के बीच कोई वास्तविक वित्तीय कनेक्शन था?
  • ₹300 करोड़ की Supply का पूरा Documentary Breakup क्या है?
  • और सबसे अहम—सरकारी भुगतान के बाद पैसा आखिर किन खातों तक पहुंचा?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों, अस्पताल के रिकॉर्ड, Tender Files, Supply Records, GST और Bank Transactions की जांच से ही सामने आ सकते हैं।

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