सिद्धार्थनगर स्थित ऐतिहासिक धरोहर पिपरहवा (कपिलवस्तु) इस समय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। लगभग सवा सौ साल पहले विदेश भेजे गए भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की भारत वापसी ने इस क्षेत्र को आध्यात्मिक और पर्यटन के नक्शे पर एक नई पहचान दिलाई है। वर्तमान में ये धरोहरें जहां श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही हैं, वहीं सिद्धार्थनगर के विकास के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। यह उपलब्धि न केवल पुरातात्विक है, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान की वापसी का प्रतीक भी है।
पिपरहवा का ऐतिहासिक महत्व वर्ष 1898 से जुड़ा है, जब यहां खुदाई में बुद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण अवशेष मिले थे, जिन्हें बाद में देश से बाहर भेज दिया गया था। दशकों तक देश से दूर रहने के बाद इन धरोहरों की वापसी ने पूरे क्षेत्र में उत्साह और गर्व का माहौल बना दिया है।
नीलामी पर रोक और सम्मानजनक वापसी: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सिद्धार्थनगर महोत्सव के दौरान जानकारी दी थी कि विदेश में इन अवशेषों को उचित सम्मान नहीं मिल रहा था और ताइवान में इनकी नीलामी तक की नौबत आ गई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताया कि सरकार के हस्तक्षेप से न केवल नीलामी रोकी गई, बल्कि धरोहरों को सुरक्षित वापस लाया गया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और विपश्यना केंद्र: उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कुछ समय पूर्व इन अवशेषों को प्रदर्शनी के लिए रूस के काल्मिकिया नगर भी ले जाकर पिपरहवा की अंतरराष्ट्रीय पहचान को और मजबूत किया। मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की है कि कपिलवस्तु क्षेत्र में एक भव्य विपश्यना केंद्र (Vipassana Center) विकसित किया जा रहा है, जिसमें आवासीय सुविधाओं सहित कई विकास कार्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
कपिलवस्तु, जिसे भगवान बुद्ध की क्रीड़ास्थली माना जाता है, जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां श्रद्धालुओं की संख्या में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 और 2025 की अवधि में सार्क (SAARC) और बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों के हजारों श्रद्धालुओं सहित कुल मिलाकर लगभग 90 हजार से अधिक भारतीय और विदेशी पर्यटक यहां स्तूप दर्शन के लिए पहुंचे हैं। यह संख्या स्पष्ट करती है कि पिपरहवा अब केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
भगवान बुद्ध की करुणा, शांति और सत्य के संदेश से जुड़ी यह पावन धरती आज सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन चुकी है, जिससे सिद्धार्थनगर क्षेत्र को पर्यटन और आर्थिक विकास के नए व उज्ज्वल अवसर प्राप्त हो रहे हैं।







