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काशी की ‘कपड़ा फाड़ होली’: ग्रहण के बाद रंगों से सराबोर हुई धर्मनगरी!

हाल ही में, धर्मनगरी काशी में रंगों की रौनक एक बार फिर लौट आई है, जहां होली का उत्साह चरम पर है। एक छोटे से अंतराल के बाद, शुभ मुहूर्त शुरू होते ही, पूरा शहर ढोल-नगाड़ों की थाप और “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ रंग-अबीर से सराबोर हो उठा। काशी की यह होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं और भाईचारे का जीवंत प्रतीक है।

शहर के प्रमुख इलाकों जैसे चौक, गोदौलिया, लक्सा, अस्सी और मैदागिन में युवाओं की टोलियां पूरे होलियाना अंदाज में झूमती नजर आईं। इस उत्सव का सबसे खास आकर्षण बनारस की पारंपरिक ‘कपड़ा फाड़ होली’ रही, जिसे शहर की एक अनूठी पहचान माना जाता है। इस परंपरा में मित्र आपस में मस्ती करते हुए एक-दूसरे के कपड़े फाड़ते हैं और उन्हें रंगों से सराबोर कर देते हैं। इसे यहां भाईचारे और बेफिक्र उल्लास का प्रतीक माना जाता है।

गंगा घाटों पर भी उत्साह का अलग ही नजारा देखने को मिला। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान के बाद एक-दूसरे को गुलाल लगाकर बधाई दे रहे थे। फाग गीतों की गूंज, भांग और ठंडई की खुशबू के बीच बनारसी ठाठ पूरी तरह झलक रहा था। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि काशी की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता का उत्सव है, जहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, सब एक-दूसरे को गले लगाकर रंग लगाते हैं।

प्रशासन की ओर से भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। प्रमुख चौराहों और संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात रहा, ताकि पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। इस बार भी काशी ने अपनी जीवंत परंपराओं के साथ रंगों के त्योहार को पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ मनाया, जहां ‘कपड़ा फाड़ होली’ ने बनारस की सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर साकार कर दिया।

कुल मिलाकर, काशी एक बार फिर रंगोत्सव में पूरी तरह डूब गई और उसने दिखा दिया कि यह सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि उत्सव और सद्भाव का एक जीवंत प्रतीक है।