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500 वर्ष पुराने केदारेश्वर महादेव मंदिर में जीर्णोद्धार व प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का शुभारंभ, निकली भव्य कलश यात्रा

वाराणसी के सोनबरसा गांव स्थित लगभग 500 वर्ष पुराने केदारेश्वर महादेव मंदिर के जीर्णोद्धार एवं प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के तहत पहले दिन प्रायश्चित, पंचांग पूजा, मंडप प्रवेश और मंडप पूजन का आयोजन किया गया। यह सभी धार्मिक अनुष्ठान आचार्य संतोष मिश्रा की देखरेख में कई वैदिक ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न कराए गए।

इसी क्रम में श्री शिव कथा का दिव्य और मंगलमय शुभारंभ परम पूज्य सिद्ध बाबा नरसिंह दास जी महाराज के पावन सानिध्य में हुआ। इस अवसर पर निकाली गई भव्य कलश यात्रा और कथा में क्षेत्र के श्रद्धालु भक्तों की बड़ी संख्या में सहभागिता देखने को मिली। पूरा वातावरण हर-हर महादेव के जयघोष से भक्तिमय हो उठा।

कथा के प्रथम दिवस महाराज ने शिवभक्ति, शिवलिंग की उत्पत्ति और शिव तत्व से जुड़ी कई दिव्य और प्रेरणादायक कथाओं का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि शिवलिंग ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है और सच्ची शिवभक्ति से मनुष्य के जीवन में धर्म, शांति, सद्भाव और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कार्यक्रम में विश्व विराट विजय राघव मंदिर के महंत महामंडलेश्वर स्वामी महावीर दास भी उपस्थित रहे। उन्होंने बेलपत्र और शिव प्रसाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और श्रद्धा से अर्पित किया गया बेलपत्र समस्त पापों का नाश करता है। वहीं शिव प्रसाद का सेवन करने से भक्त के जीवन में शांति, सकारात्मकता और शिव कृपा की प्राप्ति होती है।

मीडिया से बातचीत के दौरान संत नरसिंह दास जी महाराज ने कहा कि संतों को मर्यादा और संयम के साथ समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। उन्होंने वाराणसी में शंकराचार्य के मुद्दे पर कहा कि शंकराचार्य का पद अत्यंत प्रतिष्ठित और मर्यादित है, उसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे शंकराचार्य का सम्मान करते हैं और गौ माता को राष्ट्रमाता व राज्य माता का दर्जा दिलाने के अभियान का समर्थन भी करते हैं।

उन्होंने योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में कहा कि उनके नेतृत्व में सनातन संस्कृति का ध्वज और अधिक बुलंद हुआ है तथा अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और भव्य मंदिर निर्माण इसका उदाहरण है।

उन्होंने यह भी कहा कि उनका व्यक्तिगत मत है कि योगी आदित्यनाथ और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक साथ बैठकर आपसी संवाद से इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए, ताकि संत समाज की मर्यादा बनी रहे और सनातन समाज में किसी प्रकार का भ्रम या विवाद उत्पन्न न हो।