उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमालय की गोद में स्थित श्री बद्रीनाथ धाम को धरती का वैकुंठ (भू-बैकुंठ) माना जाता है. वैसे तो पूरे देश में दीपावली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन बद्रीनाथ धाम में कार्तिक अमावस्या पर मनाया जाने वाला दीपोत्सव अपने आप में अद्वितीय, अलौकिक और दिव्य होता है. बर्फ की सफेद चादर से ढकी पहाड़ियों के बीच जब हजारों दीयों की रोशनी से मंदिर परिसर जगमगाता है, तो वहां का आध्यात्मिक वातावरण देखते ही बनता है.
आइए जानते हैं कि बद्रीनाथ धाम में दीपावली क्यों इतनी खास होती है और इसके पीछे क्या-क्या पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं..
बद्रीनाथ में क्यों खास होती है दीपावली?
बद्रीनाथ धाम में दीपावली का त्योहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक महा-उत्सव है. इस पावन अवसर पर मंदिर को क्विंटलों देव-पुष्पों (गेंदे और अन्य गंधराज फूलों) से सजाया जाता है. इस वर्ष बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) और स्थानीय सहयोग से मंदिर परिसर में 33,000 से अधिक दीये जलाकर महा-दीपोत्सव मनाया जा रहा है.
यह उत्सव इसलिए भी भावुक और महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसके ठीक बाद शीतकाल के लिए भगवान बद्री विशाल के कपाट बंद होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. कपाट बंद होने से ठीक पहले भगवान के इस भव्य और दिव्य रूप के साक्षी बनने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु हाड़ कंपाने वाली ठंड में भी धाम पहुंचते हैं.
पौराणिक मान्यताएं: क्यों मनाई जाती है यहां दीपावली?
बद्रीनाथ धाम में दीपावली मनाने और इस दिन विशेष पूजा करने के पीछे कई बेहद महत्वपूर्ण पौराणिक और शास्त्रीय कारण हैं:
- लक्ष्मी-नारायण और कुबेर देव का दिव्य मिलन
शास्त्रों के अनुसार, बद्रीनाथ धाम इकलौता ऐसा पावन स्थल है जहां भगवान नारायण के साथ धन के देवता कुबेर जी और माता लक्ष्मी साक्षात रूप में विराजमान हैं. कुबेर देव को बद्रीनाथ मंदिर का ‘खजांची’ (कोषाध्यक्ष) माना जाता है. धनतेरस से शुरू होकर दीपावली तक यहां कुबेर देव के खजाने की विशेष वैदिक मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. माना जाता है कि इस दिन यहां पूजा करने से जीवन में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती.
- माता लक्ष्मी को 56 भोग और गर्भगृह का निमंत्रण
दीपावली की मुख्य रात को जगत जननी माता लक्ष्मी की विशेष आराधना होती है. इस दिन माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए 56 भोग का भव्य प्रसाद चढ़ाया जाता है. दीपावली की इस रात को एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान होता है, जिसमें माता लक्ष्मी को मुख्य गर्भगृह में आकर भगवान नारायण के वामांग (बाईं ओर) विराजमान होने का निमंत्रण दिया जाता है, ताकि शीतकाल में जब कपाट बंद हों, तो लक्ष्मी-नारायण एक साथ रहें.
- नर-नारायण की तपस्थली और अंधकार पर विजय
एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह क्षेत्र भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक ‘नर और नारायण’ की प्राचीन तपस्थली है. दीपावली का पर्व साक्षात नारायण के आंगन में मनाना, भक्तों के भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का प्रतीक माना जाता है.
कपाट बंदी से जुड़ा है दीपावली का महत्व
बद्रीनाथ में दीपावली का समापन कपाट बंद होने के अंतिम पड़ाव की ओर ले जाता है. दीपावली के बाद पांच दिनों तक चलने वाली विशेष ‘पंच पूजाएं’ शुरू होती हैं, बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे. इसके बाद भगवान बद्री विशाल की शीतकालीन पूजा जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में स्थानांतरित हो जाती है.


