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ट्रंप का बड़ा फैसला: अमेरिका UN समेत 66 वैश्विक संगठनों से होगा बाहर, भारत का ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ भी निशाने पर

डोनाल्ड ट्रंप और उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति एक बार फिर वैश्विक मंच पर भूचाल ला रही है। अपने संभावित दूसरे कार्यकाल की बड़ी रणनीति पेश करते हुए, ट्रंप प्रशासन ने एक ऐसा फैसला लिया है जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को जड़ से हिला सकता है। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण निकायों सहित लगभग 60 से 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा की है। यह कदम जलवायु परिवर्तन से लेकर महिला सशक्तिकरण तक, हर वैश्विक नीति पर गहरा असर डालेगा।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन संगठनों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि ये अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। ट्रंप ने बार-बार जोर दिया है कि अमेरिका इन संस्थानों को सबसे ज्यादा धन देता है, लेकिन इसका लाभ अमेरिका को नहीं, बल्कि खास तौर पर चीन जैसे दूसरे देशों को मिलता है। यह फैसला ट्रंप के पहले कार्यकाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकलने की नीति का ही विस्तार है, लेकिन इस बार इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है।

कौन से अहम संगठन प्रभावित होंगे?

इस सूची में कई बेहद महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। सबसे प्रमुख है जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का मुख्य समझौता, ‘यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज’ (UNFCCC)। इसी के तहत पेरिस जलवायु समझौता हुआ था। अमेरिका इस समझौते से बाहर निकलने वाला पहला देश बन गया है। इसका सीधा मतलब है कि जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक बैठकों और नीतियों में अमेरिका की सीधी भागीदारी अब समाप्त हो जाएगी।

इसके अलावा, महिलाओं के अधिकार और सशक्तिकरण के लिए काम करने वाला ‘यूएन वूमेन’ संगठन, तथा मां-बच्चे की सेहत और परिवार नियोजन पर काम करने वाला ‘यूएन पॉपुलेशन फंड’ भी अब अमेरिका की फंडिंग और प्राथमिकता में नहीं रहेंगे।

भारत के लिए क्या है चिंता की बात?

भारत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संगठन भी इस फैसले की चपेट में है: ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ (ISA)। यह संगठन सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भारत और फ्रांस ने मिलकर शुरू किया था और इसका मुख्यालय हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित है। ट्रंप का मानना है कि ऐसे मंच अमेरिका के औद्योगिक और आर्थिक हितों के खिलाफ जाते हैं, इसलिए अमेरिका इससे भी अलग होने जा रहा है।

बचत और विशेषज्ञों की चिंता

व्हाइट हाउस का कहना है कि इन संगठनों से बाहर निकलने से अमेरिका का अरबों डॉलर बचेगा, जिसे देश के अंदरूनी मुद्दों, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जाएगा। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति, व्यापार शुल्क और द्विपक्षीय समझौतों के जरिए दुनिया में अपना प्रभाव बनाए रखेगा।

हालांकि, कई विशेषज्ञ इस फैसले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक कोशिशों को बड़ा झटका लगेगा। इसके साथ ही, विकासशील देशों में महिलाओं और बच्चों से जुड़े कार्यक्रमों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। यह फैसला साफ दिखाता है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर पहले से कहीं ज्यादा सख्त हो चुके हैं।

यह कदम स्पष्ट रूप से ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की कठोरता दिखाता है। अब सवाल यही है कि वैश्विक मंच से इतनी बड़ी दूरी बनाना अमेरिका को मजबूत करेगा या उसे दुनिया में अलग-थलग कर देगा, जिसका असर आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

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