महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं, लेकिन असली सत्ता का संघर्ष—मेयर पद को लेकर—अब शुरू हुआ है। मुंबई (BMC) समेत राज्य के 29 नगर निगमों में मेयर कौन बनेगा, यह फैसला सिर्फ सीटों की संख्या पर नहीं, बल्कि गठबंधन की खींचतान, दिल्ली में हो रही हाई-लेवल बैठकों और एक अप्रत्याशित ‘लॉटरी सिस्टम’ पर निर्भर करेगा। मेयर की कुर्सी अब सिर्फ एक प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में शक्ति, नियंत्रण और भविष्य की राजनीति की चाबी बन चुकी है।
महाराष्ट्र में बीजेपी और शिंदे गुट की शिवसेना ने 29 में से 23 नगर निगमों में जीत दर्ज की है, लेकिन जीत के बाद मेयर पद को लेकर दोनों सहयोगियों के बीच खींचतान तेज हो गई है। यह मामला अब नगर निगम से उठकर दिल्ली दरबार पहुँच गया है, जहाँ दोनों गुटों के बड़े नेता महाराष्ट्र की शहरी सरकारों का भविष्य तय कर रहे हैं।
दिल्ली में हाई-स्टेक बैठकें और आंतरिक विवाद
शक्तिशाली नगर निगमों का भविष्य तय करने के लिए बीजेपी के मुंबई अध्यक्ष आमित साटम, वरिष्ठ नेता आशिष शेलार और शिंदे गुट से राहुल शेवाले लगातार दिल्ली में बैठकों का दौर चला रहे हैं। यह विवाद सिर्फ मेयर पद तक सीमित नहीं है, बल्कि स्टैंडिंग कमेटी, हेल्थ कमेटी और एजुकेशन कमेटी जैसी ताकतवर समितियों के नियंत्रण को लेकर भी है।
बीजेपी का तर्क स्पष्ट है: चूँकि बीएमसी में उनके 89 पार्षद हैं, जबकि शिंदे गुट के केवल 29, इसलिए मेयर पद पर नेतृत्व उसका होना चाहिए। वहीं, शिंदे गुट का कहना है कि गठबंधन होने के नाते सम्मान और शक्ति में साझेदारी बराबरी की होनी चाहिए। यही खींचतान महायुति के अंदर तनाव की मुख्य वजह बन रही है।
किस्मत का खेल: लॉटरी सिस्टम तय करेगा आरक्षण
इस राजनीतिक गणित में सबसे बड़ा मोड़ लॉटरी सिस्टम ला रहा है। आज 22 जनवरी को महाराष्ट्र सरकार 29 नगर निगमों के मेयर पद का आरक्षण लॉटरी के माध्यम से तय करेगी। इस लॉटरी से यह निर्धारित होगा कि किस नगर निगम में मेयर का पद जनरल, ओबीसी, एससी/एसटी या महिला के लिए आरक्षित होगा।
आरक्षण तय होते ही पूरी बाज़ी पलट सकती है, जिसके बाद:
आरक्षण के अनुरूप मेयर के उम्मीदवार तय होंगे।
गठबंधन का अंतिम फार्मूला (जैसे, मेयर बीजेपी का और डिप्टी मेयर शिंदे गुट का) बन पाएगा।
यह लड़ाई सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है, बल्कि ठाणे, नवी मुंबई, उल्हासनगर, और कल्याण-डोंबिवली जैसे सभी प्रमुख शहरों में मेयर पद को लेकर राजनीतिक गणित तेज़ हो चुका है। विपक्षी दलों, विशेषकर शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस, ने दिल्ली में हो रही इन बैठकों पर सवाल उठाते हुए इसे मराठी अस्मिता और लोकतंत्र का अपमान बताया है, उनका आरोप है कि महाराष्ट्र के फैसले महाराष्ट्र में ही होने चाहिए।
दिल्ली की बैठकों, महाराष्ट्र की राजनीति की जटिलताओं, और लॉटरी सिस्टम के परिणाम मिलकर तय करेंगे कि अगले 24 घंटों में महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों पर किसका राज होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि बीएमसी के दंगल में जीत की बाजी कौन मारता है और महायुति का नया पावर-शेयरिंग फॉर्मूला क्या होता है।
