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बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी पर सियासी घमासान: ‘मुंबई धर्मशाला बनकर रह गई’, उद्धव गुट का केंद्र पर तीखा वार

बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी पर सियासी घमासान

हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी के अवसर पर महाराष्ट्र की राजनीति का पारा एक बार फिर चढ़ गया है। शिवसेना संस्थापक की 100वीं जयंती (अगर वह जीवित होते) को उद्धव ठाकरे गुट ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने के लिए एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया है। मुंबई को लेकर दिए गए बयान ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, जिससे मराठी अस्मिता का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया है।

बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी के मौके पर, उद्धव ठाकरे गुट के मुखपत्र ‘सामना’ में छपे संपादकीय ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। ‘सामना’ के संपादक संजय राउत ने सीधे तौर पर मुंबई की स्थिति पर तंज कसते हुए लिखा कि, “मुंबई धर्मशाला बनकर रह गई है… आओ-जाओ, घर तुम्हारा!” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि देश में ऐसे लोग सत्ता में बैठे हैं, जो उम्रदराज होने के बावजूद आज भी देश पर बोझ बने हुए हैं। संपादकीय में दावा किया गया कि आज मराठी समाज नेतृत्वहीन है और उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती।

मुंबई में मराठी मानुस के अस्तित्व को लेकर गहरी चिंता जाहिर की गई है। संपादकीय में कहा गया है कि जिस महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई है, वहीं मराठी होना आज नजरअंदाज किए जाने की वजह बन गया है। इस बात को सरकारी आंकड़ों और सामाजिक सच्चाइयों से जोड़ा गया है। तथ्यों के अनुसार, गिरणगांव (टेक्सटाइल मिल एरिया) में कभी ढाई से तीन लाख मिल मजदूर काम करते थे, जो 80-90 के दशक में मिलें बंद होने के बाद बड़े पैमाने पर मुंबई से बाहर जाने को मजबूर हुए। जहां कभी मिलों की चिमनियां थीं, आज वहां लक्जरी टावर और कॉर्पोरेट दफ्तर खड़े हो गए हैं, जिसने शहर के भूगोल को बदल दिया है। ‘सामना’ ने यहां तक दावा किया कि अगर बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना न की होती, तो मुंबई से मराठी लोग कब के मिट चुके होते।

इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत यह है कि बालासाहेब को श्रद्धांजलि देने के लिए उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे पहली बार एक मंच पर साथ आए। षण्मुखानंद हॉल में दोनों ठाकरे भाइयों का एक साथ दिखना 2024 के बाद की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी की बढ़ती ताकत और शिवसेना में विभाजन के बीच, यह कदम मराठी पहचान की राजनीति को पुनर्जीवित करने और उद्धव गुट को उसके मूल एजेंडे पर वापस लाने की एक सोची-समझी कोशिश है।

बालासाहेब ठाकरे के विचार आज भी महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी बने हुए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बयानबाजी मराठी अस्मिता को फिर से राजनीति के केंद्र में ला पाती है, या यह सिर्फ तात्कालिक सियासी हमला बनकर रह जाएगी।

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