बीएमसी मेयर चुनाव: बहुमत होने के बावजूद क्यों फंसा पेंच? शिंदे गुट बना किंगमेकर

बीएमसी मेयर चुनाव
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भारत की सबसे अमीर नगर निगम, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में मेयर पद के चुनाव को लेकर राजनीतिक तापमान चरम पर है। लगभग चार साल के अंतराल के बाद हो रहे इन चुनावों में, जहां एक तरफ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, वहीं सहयोगी एकनाथ शिंदे गुट (शिवसेना) की शर्तें इस पूरे समीकरण को दिलचस्प मोड़ दे रही हैं। 114 का बहुमत आंकड़ा पार होने के बावजूद, मेयर की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इसका फैसला अब 11 फरवरी को होगा, जब बैठकों और समझौतों के बाद मुंबई को नया नेतृत्व मिलेगा।

बीएमसी मेयर पद पर फंसा पेंच, ये हैं प्रमुख समीकरण:

बीएमसी मेयर का पद सामान्य वर्ग की महिला के लिए आरक्षित है। हालिया नतीजों में बीजेपी 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि उसकी सहयोगी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के पास 29 सीटें हैं। दोनों दलों के पास मिलकर कुल 118 सीटें हैं, जो बहुमत के लिए ज़रूरी 114 सीटों से कहीं ज़्यादा हैं। मेयर पद के लिए 6 और 7 फरवरी को नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि 11 फरवरी को नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि है और उसी दिन मेयर और डिप्टी मेयर के लिए चुनाव होगा।

संख्याबल में आगे होने के बावजूद, मेयर पद पर पेंच इसलिए फंसा है क्योंकि शिंदे गुट खुद को सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि किंगमेकर मान रहा है। शिंदे शिवसेना का साफ कहना है कि मेयर की कुर्सी पर सिर्फ बीजेपी का अधिकार नहीं, बल्कि शिवसेना की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। चर्चा है कि बीजेपी और शिंदे शिवसेना के बीच तालमेल बिठाने के लिए डिप्टी मेयर पद और अहम स्टैंडिंग कमेटियों की जिम्मेदारी शिंदे गुट को दी जा सकती है। यह सत्ता-साझेदारी बीजेपी के लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन चुकी है।

मेयर पद के लिए बीजेपी के भीतर भी कई नामों पर मंथन जारी है। हर्षिता नरवेकर, ऋतु तावड़े और शीतल गंभीर जैसे नाम दावेदारों की सूची में हैं। पार्टी में एक धड़ा चाहता है कि अनुभवी कार्यकर्ता को मौका मिले, वहीं दूसरा उभरते चेहरों पर दांव लगाने के पक्ष में है। इस बीच, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) भी मुकाबले में है। पार्टी ने अपने पार्षदों को एकजुट रहने के निर्देश दिए हैं और संकेत दिए हैं कि वे मेयर पद के लिए अपना उम्मीदवार उतार सकते हैं, जिसका उद्देश्य बीएमसी की राजनीति में अपनी निर्णायक ताकत दिखाना है।

यह राजनीतिक महायुद्ध सिर्फ सीटों और पदों का नहीं है; यह मुंबई के प्रशासनिक भविष्य को तय करेगा। 11 फरवरी को होने वाला फैसला स्पष्ट करेगा कि बीजेपी अपने गठबंधन को साधकर मेयर की कुर्सी अपने नाम करती है, या किंगमेकर बने शिंदे गुट को साधने के लिए बीजेपी को बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

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