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129वीं जयंती: वह योद्धा जिसने ‘आज़ादी’ को आंदोलन नहीं, युद्ध बना दिया, जानें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी

जानें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी

आज 23 जनवरी है, वह दिन जब भारत अपनी चेतना और साहस के प्रतीक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती मना रहा है। उनका जीवन एक साधारण कहानी नहीं, बल्कि क्रांति, संकल्प और अटूट राष्ट्रभक्ति का महाकाव्य है। जब उन्होंने गुलामी की नौकरी ठुकराकर भारत की आजादी को केवल ‘आंदोलन’ नहीं, बल्कि एक ‘युद्ध’ बना दिया, तभी ‘जय हिंद’ पूरे देश की धड़कन बन गया। आइए, इस खास ‘पराक्रम दिवस’ पर उस महान नेता के अदम्य साहस और अनसुलझे रहस्य को याद करते हैं।

नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही मेधावी सुभाष कलकत्ता और फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचे। 1920 में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की सबसे प्रतिष्ठित इंडियन सिविल सर्विस (ICS) परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया, लेकिन उन्होंने तुरंत ही इस प्रतिष्ठित कुर्सी को ठुकरा दिया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता सत्ता से पहले है। भारत लौटकर वे महात्मा गांधी और कांग्रेस के आंदोलन से जुड़े, हालांकि, अहिंसा के बजाय सशस्त्र संघर्ष को ही अंग्रेजों को भगाने का एकमात्र तरीका मानते थे, और यहीं से उनका रास्ता बाकी नेताओं से अलग हो गया।

साल 1941 में, जब ब्रिटिश सरकार ने नेताजी को कोलकाता में नजरबंद कर रखा था, तब उन्होंने ‘जियाउद्दीन’ नाम के बीमा एजेंट का भेष बनाकर एक साहसिक पलायन किया। यह फरारी इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में गिनी जाती है। देश से बाहर निकलने के बाद, उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी और जापान की मदद से ‘आज़ाद हिंद फौज’ (INA) का नेतृत्व किया। उन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”, “दिल्ली चलो” और “जय हिंद” जैसे अमर नारे दिए, जो आज भी रग-रग में जोश भर देते हैं। उन्होंने 1943 में आज़ाद हिंद सरकार की घोषणा की और महिलाओं को सशस्त्र संघर्ष में शामिल करने के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया, जो उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था।

नेताजी का जीवन 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई कथित विमान दुर्घटना के बाद एक रहस्य बन गया, जो आज भी अनसुलझा है। हालांकि, देश उन्हें ऐतिहासिक सम्मान दे रहा है। भारत सरकार ने 23 जनवरी को ‘पराक्रम दिवस’ (Valor Day) के रूप में मनाने का फैसला किया है, ताकि देश उनके अदम्य साहस को हमेशा याद रखे। इंडिया गेट पर जहां कभी ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक खड़ा था, आज वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। उनकी जयंती पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नेताजी का साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी हमें सिखाती है कि संकल्प और साहस से किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। जब तक ‘जय हिंद’ की गूंज सुनाई देगी, तब तक नेताजी अमर रहेंगे।

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