अरावली पहाड़ों की नई परिभाषा: संरक्षण, विवाद और सरकार के सुरक्षा कदम

अरावली
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अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं हैं। यह दिल्ली‑एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली पर्वत श्रृंखला हमारे जीवन की रक्षा करती है। यह पानी, साफ हवा और जैव विविधता का स्रोत है। अगर अरावली खो गई, तो नदियां सूखेंगी, हवा गंदी होगी और शहरों में प्रदूषण बढ़ेगा।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा दी है। अब केवल वे पहाड़ अरावली माने जाएंगे जो 100 मीटर से ऊंचे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे लगभग 90 प्रतिशत अरावली पहाड़ संरक्षण से बाहर हो सकते हैं। इसका मतलब है कि अब ये इलाके खनन, निर्माण और अन्य गतिविधियों के लिए खुले हो सकते हैं।

इस निर्णय के बाद पर्यावरण विशेषज्ञ, एक्टिविस्ट और स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे जंगल, जल और वन्यजीवों पर बुरा असर होगा। NCR जैसे शहरों में धूल, प्रदूषण और मौसम प्रभावित होंगे। लोग सोशल मीडिया और petitions के जरिए अरावली को बचाने की अपील कर रहे हैं।

सरकार का कहना है कि नई परिभाषा अरावली की सुरक्षा कमजोर नहीं करेगी। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बताया कि नियम अब भी लागू रहेंगे और संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा जाएगा। कई इलाके पहले से ही खनन‑मुक्त जोन में हैं।

असल में, पहले भी अरावली के कई हिस्सों में अवैध खनन और निर्माण हुआ करते थे। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार रोक लगाने के निर्देश दिए थे। राजस्थान और हरियाणा सरकारें वन संरक्षण और भूमि सुधार परियोजनाएं चला रही हैं। इसमें प्लांटेशन, ग्रासलैंड सुधार और वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अरावली का संरक्षण कमजोर हुआ, तो थार रेगिस्तान फैल सकता है, भूजल स्तर गिर सकता है और वन्यजीवों का आवास खतरे में पड़ सकता है। Delhi‑NCR में धूल और प्रदूषण भी बढ़ सकते हैं।

केंद्रीय सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि अरावली में किसी भी नई माइनिंग लीज को मंजूरी नहीं दी जाएगी। साथ ही, ICFRE यानी इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने के लिए कहा गया है, जहां खनन पर पूरी तरह रोक लगाना जरूरी है।

राजनीतिक हलकों में भी यह मुद्दा गरमा गया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर अरावली की नई परिभाषा और खामियों को लेकर सवाल उठाए, जबकि केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसे गलत जानकारी बताया। उनका कहना है कि केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में कानूनी रूप से खनन हो सकता है और सरकार अरावली की सुरक्षा और पुनर्स्थापन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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